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दुनिया

अपने ही घर में बेगाने होते बुजुर्ग

भारत में बुजुर्गों यानी 60 साल से ज्यादा उम्र की लगभग आधी आबादी रिश्तेदारों के शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का शिकार हैं. देश के 12 महानगरों में हुए एक ताजा सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है.

सामाजिक संस्था हेल्पेज इंडिया के सर्वेक्षण के तहत देश के 12 महानगरों में 1200 से ज्यादा बुजुर्गों से बातचीत की गई. इनमें से लगभग आधे लोगों ने कहा कि वह अपने ही घर में बेगाने हैं. उनको लगभग रोजाना किसी न किसी रूप में अत्याचार सहना पड़ता है. पिछले साल ऐसे लोगों की तादाद महज 23 फीसदी थी. यानि एक साल में उत्पीड़न के शिकार बुजुर्गों की तादाद दोगुनी से ज्यादा बढ़ी है. फिलहाल भारत में ऐसे लोगों की आबादी 10 करोड़ है और अनुमान है कि 2050 तक यह बढ़ कर 32 करोड़ हो जाएगा.

सर्वेक्षण के दौरान लगभग 70 फीसदी लोगों ने कहा कि उनको पुलिस हेल्पलाइन के बारे में जानकारी है. लेकिन घर का माहौल खराब होने की वजह से शिकायत नहीं करना चाहते. इन लोगों को डर है कि एक बार पुलिस में शिकायत के बाद उन पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न तेज हो सकता है. सर्वेक्षण के नतीजों से साफ है कि ज्यादातर मामलों में इन बुजुर्गों को बहुओं की ओर से किए गए उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. कोई 61 फीसदी लोगों ने अपनी स्थिति के लिए बहुओं को जिम्मेदार ठहराया है.

मुंबई में रहने वाले 47 फीसदी बुजुर्गों ने कहा कि उनको पिछले तीन से पांच साल के दौरान सप्ताह में कम से कम एक दिन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. दिलचस्प बात है कि जिन लोगों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया उनमें से 92 फीसदी अपने मकान में ही रहते हैं. बावजूद इसके उनको उत्पीड़न का शिकार होना पड़ रहा है. सर्वेक्षण के नतीजों में कहा गया है कि ऐसे बुजुर्गों में से आधे अपने ही घर में कैदी की तरह रह रहे हैं.

कानून

बुजुर्गों को सामाजिक और कानूनी सुरक्षा मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार ने कोई सात साल पहले मेंटेनेंस एंड वेलफेयर आफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजेंस एक्ट, 2007 कानून बनाया. लेकिन ज्यादातर लोगों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. जो इस बारे में जानते हैं वे भी बच्चों की ओर से बदले की कार्रवाई के डर से इस मामले में कानूनी सहायता लेने से हिचकते हैं. हेल्पेज इंडिया मुंबई के निदेशक प्रकाश बोरगांवकर कहते हैं, "बुजुर्गों को पारिवारिक इज्जत का ज्यादा ख्याल होता है. इसलिए वह घर के मामले को पुलिस तक ले जाने में हिचकते हैं." वह बताते हैं कि बुजुर्गों के उत्पीड़न के मामले में नागपुर सबसे ऊपर है, जहां 85 फीसदी बुजुर्ग मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के शिकार हैं.

बुजुर्गों का दर्द

वरिष्ठ नागरिक समिति के सदस्य दिनेश कौल का कहना है, "मौजूदा सामाजिक माहौल बुजुर्गों के लिए कष्टदायक है. वरिष्ठ नागरिकों को उचित सम्मान नहीं मिल रहा है." एक बुजुर्ग दिनेश कुमार गोयल कहते हैं, "आज की युवा पीढ़ी के पास माता पिता का दुख दर्द सुनने का समय नहीं है. युवा वर्ग ने भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों का सम्मान करने की परंपरा को भी दरकिनार कर दिया है." 72 साल की शाश्वती घोष ने तीन साल पहले अपनी संपत्ति बेटी के नाम कर दी. लेकिन बेटी दामाद ने उनका ख्याल रखना छोड़ दिया.

विशेषज्ञों की राय

कई लोगों का कहना है कि शुचिता और नैतिकता की बेड़ियों में फंसे ज्यादातर बुजुर्ग अपने ही परिजनों के खिलाफ कार्रवाई से कतराते हैं. यही वजह है कि अपने ही उनका उत्पीड़न करते रहे हैं. जाने माने समाजशास्त्री सुनील धर कहते हैं, "ज्यादातर मामलों में कमाऊ बच्चे अपने बुजुर्ग माता पिता को घर से अलग कर देते हैं और सप्ताह में एक बार उनसे मिलने जाते हैं." वह कहते हैं कि ऐसे बुजुर्गों की स्थिति फिर भी कुछ बेहतर है. लेकिन घर बेटे बहू या फिर बेटी दामाद के साथ रहने वाले बुजुर्गों की हालत दयनीय है. ज्यादातर मामलों में संपत्ति का मालिक होने के बावजूद उनको रोजाना कटुक्तियां झेलनी पड़ती हैं. एक अन्य समाजशास्त्री मनोज गोयल कहते हैं, "टूटते संयुक्त परिवारों ने बुजुर्गों की बदहाली में अहम भूमिका निभाई है. अब एकल परिवारों में लोगों को बुजुर्गों की रोक-टोक पसंद नहीं आती. इस वजह से उन लोगों को अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ता है."

विशेषज्ञों का कहना है कि इस सामाजिक समस्या को दूर करने के लिए सरकार के साथ साथ गैरसरकारी संगठनों को भी आगे आना होगा. उसी स्थिति में बुजुर्गों को समाज और परिवार में वह सम्मान मिल सकेगा जिसके वह हकदार हैं.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: अनवर जे अशरफ

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