अपनी भाषा से उदासीनता नहीं: ओरसिनी | मनोरंजन | DW | 03.08.2014
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मनोरंजन

अपनी भाषा से उदासीनता नहीं: ओरसिनी

फ्रांचेस्का ओरसिनी इटली की हैं और हिन्दी भाषा और समाज की गंभीर अध्येता हैं. उनका कहना है कि भूमंडलीकरण के बावजूद अपनी भाषा से उदासीनता नहीं बरतनी चाहिए.

फ्रांचेस्का ओरसिनी अपनी मातृभाषा इटैलियन के अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और जर्मन बहुत अच्छी तरह जानती हैं. धाराप्रवाह हिन्दी और उर्दू बोलने वाली फ्रांचेस्का ओरसिनी ने कई किताबें लिखी हैं जिनमें ‘द हिन्दी पब्लिक स्फीयर (1920-1940): लैंगवेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशनलिज्म' काफी मशहूर हुई और इसका हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ. काफी सालों तक केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाने के बाद 2006 से वे लंदन-स्थित स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज के दक्षिण एशिया विभाग में हिन्दी एवं दक्षिण एशियाई साहित्यों की प्रोफेसर हैं. इन दिनों वे दिल्ली आई हुई हैं और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में व्याख्यान देने के बाद विकासशील समाज अध्ययन केंद्र के सहयोग से हिंगलिश पर एक कार्यशाला आयोजित कर रही हैं. उनके साथ हुई बातचीत के कुछ प्रासंगिक अंश:

पहले बात आपकी पृष्ठभूमि से शुरू करें. हिन्दी की तरफ रुझान कैसे और क्यों हुआ?

मैं इटली के मिलान शहर में पैदा हुई. वहीं शुरुआती पढ़ाई-लिखाई हुई और मैंने अन्य विषयों के अलावा पांच साल तक जर्मन सीखी. उस समय इटली के लोग यूरोप के अलावा बाकी दुनिया में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते थे. मैं वेनिस गई जहां विश्वविद्यालय में केवल हिन्दी ही पढ़ाई जाती थी. तो मैंने हिन्दी विभाग में प्रवेश ले लिया. हिन्दी सीखने के दौरान ही मैं 1986 में भारत आई और एक महीना बनारस और एक महीना इलाहाबाद रही. तब मैं उन्नीस साल की थी. बनारस में नागरी प्रचारिणी सभा के गेस्ट हाउस में रही. चारों तरफ हिन्दी की किताबें और पत्रिकाएं थीं लेकिन मेरी हिन्दी इतनी अच्छी नहीं थी कि उन्हें पढ़ कर समझ पाती. वेनिस में दो वर्ष का कोर्स खत्म करके मैं अच्छी तरह हिन्दी सीखने के इरादे से दिल्ली आई और ढाई साल रही. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मुझे एमए (हिन्दी) में प्रवेश नहीं दिया गया और मैं गर्व से कह सकती हूं कि मैं जेएनयू एंट्रेंस फेल हूं. केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में पढ़ाई की और खर्च चलाने के लिए इटैलियन भाषा सिखाने का काम भी किया.

यहां हिन्दी सीखने का अनुभव कैसा रहा?

थोड़ा अजीब था. बताया जाता था कि ‘इंतजार' मत कहो, ‘प्रतीक्षा' कहो. ‘सड़क' मत कहो, ‘मार्ग' कहो. ऐसी हिन्दी सिखाई जाती थी जो कहीं बोली नहीं जाती. आप टैक्सी वाले से बात करते वक्त क्या ‘मार्ग' बोलेंगे? “आप उचित मार्ग से नहीं ले जा रहे हैं?” तब तक मैंने श्रेष्ठ लेखकों को पढ़ना शुरू कर दिया था, मसलन ‘निराला' और ‘रेणु' वगैरह. वेनिस में चार साल मैंने सिर्फ नए कहानीकारों को पढ़ा था, जैसे मोहन राकेश या राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी, जो अपने आप में बुरे नहीं हैं, अच्छे ही हैं. लेकिन मुझे लगा कि हिन्दी में इनके अलावा भी बहुत कुछ होगा.

रेणु' को पढ़कर कैसा लगा? आप जो ढूंढ रही थीं वह मिला?

शुरू में तो कुछ समझ में ही नहीं आया. फिर बोलकर पढ़ना शुरू किया तो समझ में आने लगा. पूरी तरह आया, यह तो अभी भी नहीं कह सकती, लेकिन लगा कि वाह, क्या लेखक हैं! ‘निराला' का गद्य तो अद्भुत है, ‘कुल्ली भाट', ‘चतुरी चमार', ‘बिल्लेसुर बकरिहा'. रामविलास शर्मा ने अपनी किताब में उनका और उनके समय के समाज का बहुत अच्छा चित्र खींचा है. मैं उस काल और उसके समाज पर ही शोध करना चाहती थी. मेरे मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि एक ओर भाषा के बारे में संकीर्ण दृष्टि विकसित हो रही थी और दूसरी ओर ‘निराला' जैसे लोग एक अलग ही किस्म की भाषा लिख रहे थे. यह क्यों और कैसे हो रहा था? पहले सोचा था ‘निराला' पर ही पीएचडी करूं पर फिर तय किया कि 1920 और 1940 के बीच के हिन्दी जगत पर करूंगी. ‘हिन्दी स्फीयर' वाली किताब मेरी पीएचडी थीसिस ही है. यह शोध अधिकतर उस काल की पत्रिकाओं और साहित्यिक संस्थाओं के दस्तावेजों के आधार पर किया गया था. उस समय की पत्रिकाओं में इतने किस्म के विवाद और इतनी अलग-अलग तरह की सामग्री मिलती है, सचमुच बहुत ही दिलचस्प है.

और इसके बाद? आपकी तो कई और किताबें भी छपी हैं.

फिर मैंने उर्दू और फारसी सीखना शुरू किया. मेरे मन में सवाल उठा कि उन्नीसवीं सदी में भारतेन्दु से कुछ पहले या उनके आसपास भी, बाजार के लिए कैसी किताबें छापी जा रही थीं. तो मैंने उस समय की हिन्दी और उर्दू की किताबों पर काम किया. उस समय के छापेखाने जासूसी उपन्यास, गाने, बारहमासे, कहानियां, तमाम तरह की चीजें छाप रहे थे.

हिंगलिश पर आपकी क्या राय है?

यह या तो अंग्रेजी जानने वालों की भाषा है जो हिन्दी बहुत कम जानते हैं, और या फिर उन हिन्दीवालों की भाषा है जो अंग्रेजी सीख रहे हैं और हिन्दी में ज्यादा-से-ज्यादा अंग्रेजी शब्द डालकर बताना चाहते हैं कि उन्हें अंग्रेजी भी आती है. विज्ञापनों, गानों और फिल्मों में भी इसका इस्तेमाल हो रहा है. वह एक तरह की फन-लैंग्वेज या मजे की भाषा भी बन रही है.

मुझे मालूम नहीं कि और राज्यों का क्या हाल है, लेकिन हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी और अंग्रेजी एक-दूसरे की प्रतियोगी या दुश्मन मानी जाती हैं. या तो आप हिन्दी वाले हैं या फिर अंग्रेजी वाले हैं. अंग्रेजी तरक्की की भाषा है और हर परिवार अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाना चाहता है. लेकिन अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता बनी हुई है. अंग्रेजी सीखिये लेकिन अपनी भाषा की तरफ उदासीनता मत बरतिए.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

संबंधित सामग्री