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विज्ञान

अपनी बिजली खुद बनाते जर्मन

जर्मनी के फ्राइबुर्ग शहर में रहने वाले क्लाइस मायर अपने पुशतैनी होटल के लिए बिजली खुद बनाते हैं. इसके तीन कारण हैं, बचत, ऊर्जा की बेहतर क्षमता और पर्यावरण संरक्षण. जर्मनी में कई छोटे उद्योगपति यह तरीका अपना रहे हैं.

अपने इस्तेमाल के लिए खुद बिजली बनाना व्यापारियों के अलावा मकान मालिकों, स्कूलों और अस्पतालों को खूब भा रहा है. जर्मनी में हर साल करीब 600 टेरा वॉट घंटा बिजली की खपत होती है. इसमें से 50 टेरावॉट घंटा बिजली लोग खुद बना रहे हैं, जो कि लगभग आठ फीसदी है. तरीका आसान है, घरों पर सोलर पैनल से और फैक्ट्रियों में गैस प्लांट से. घरेलू बिजली के इस्तेमाल से खर्च भी बहुत कम हो गया है.

घरेलू बिजली का बिल यूरोप में सबसे ज्याद जर्मनी में आता है. लेकिन इस बिल पर टैक्स नहीं लगता. जबकि पारंपरिक बिजली के बिल में लगभग एक तिहाई हिस्सा सरकारी तिजोरी में जाता है. यही नहीं खुद सोलर पैनल की मदद से बिजली पा रहे लोग पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचा रहे.

वाजिब निवेश

मायर का होटल 19वीं सदी का है. इसमें 45 कमरे हैं. करीब 10 साल पहले मायर ने यहां बिजली और हीटिंग की इकाई लगाई. इसे लगाने में करीब 50,000 यूरो खर्च आया. मायर कहते हैं कि नतीजे देखते हुए यह निवेश बिल्कुल भी ज्यादा नहीं रहा, पैदा करने "इस पर लगाया गया पैसा उम्मीद से कहीं जल्द वसूल हो गया."

जर्मनी के बड़े उद्योगों में बिजली की आत्मनिर्भरता के इस तरीके को बहुत साल पहले ही अपना लिया गया था. इसमें खर्च बहुत कम और क्षमता बहुत ज्यादा है. यह किसी भी कारोबार के लिए अकलमंदी की बात है. केमिकल बनाने की मशहूर कंपनी बीएएसएफ के प्रमुख कुर्ट बॉक ने बताया, "हम लुड्विग्सहाफेन में जो ऊर्जा बनाते हैं अगर इस पर टैक्स लगता तो वह करीब पांच लाख यूरो के बराबर होता है." जर्मनी के दक्षिण पश्चिमी इलाके में बीएएसएफ की फैक्ट्री में गैस ऊर्जा के तीन प्लांट हैं.

बढ़ती रुचि

पिछले साल जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स ने 2400 कंपनियों पर एक सर्वे कराया. उन्होंने पाया कि इनमें से लगभग आधी कंपनियां या तो पहले से बिजली के लिए आत्मनिर्भर हैं, या इसकी शुरुआत करने का इरादा कर रही हैं. प्लांट के निवेश में खर्च होने वाली भारी रकम के अलावा एक अन्य चिंता की बात है मौसम का असर. जर्मनी के ऊर्जा उत्पादन में वायु और सूर्य जैसे अक्षय स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ रही है. लेकिन कई बार जब मौसम साथ नहीं देता तो दिक्कत होती है.

विकेंद्रीकरण जरूरी

इस तरह की अत्मनिर्भरता से ऊर्जा निर्माण के विकेंद्रीयकरण में मदद मिल रही है, जो कि जर्मनी का खास मकसद है. जापान में 2011 में हुए फुकुशिमा हादसे के बाद जर्मनी में परमाणु ऊर्जा केंद्रों को बंद करने का फैसला किया गया. ऐसे में ऊर्जा निर्माण के वितरण को महत्वपूर्ण माना गया.

2011 से 2012 के बीच घरों में स्वनिर्मित बिजली दोगनी हुई है. हालांकि जर्मनी में घरों में इस्तेमाल हो रही कुल बिजली का अभी यह बहुत छोटा हिस्सा है, केवल आधा फीसदी. लेकिन फिर भी बिजली की बढ़ रही आत्मनिर्भरता से जर्मनी की पुरानी बिजली कंपनियां नई चुनौतियों का सामना कर रही हैं.

एसएफ/एजेए (एएफपी)

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