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ब्लॉग

अनुष्ठान नहीं अनिवार्यता है गंगा की सफाई

गंगा सिर्फ पूजा पाठ, पाप धुलने और शव बहाने की नदी ही नहीं है, देश की जैव विविधता, आर्थिकी और संस्कृति की पोषक और वाहक भी है.

केंद्र सरकार की उस महायोजना का उद्घाटन पिछले दिनों हरिद्वार में हो गया जो दो साल पहले सत्ता संभालते समय उसके एजेंडे का प्रमुख विषय रहा है- नमामि गंगे. गंगा नदी की सफाई के लिए बनी इस महापरियोजना की लागत करीब 20 हजार करोड़ रुपये की है. इसमें से ढाई सौ करोड़ रुपये उत्तराखंड में खर्च किए जाएंगें. इस मौके पर केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा सफाई मंत्री उमा भारती ने दावा किया कि 2018 तक गंगा पूरी तरह से साफ हो जाएगी और पहला नतीजा तो इसी साल अक्टूबर में दिखेगा. इस दौरान नमामि गंगे गान, वेबसाइट और नमामि गंगे ऐप भी लॉन्च किए गए.

गंगा में एक अरब लीटर सीवेज

पिछले 30 साल से गंगा का सरकारी सफाई अभियान जारी है, गंगा एक्शन प्लान पर करोड़ों रुपये बहाए जा चुके हैं. एक सरकारी आंकड़ा तो यही कहता है कि 1985 से लेकर 2014 तक चार हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. अब एक ही झटके में इससे कई गुना बड़ी राशि आ गई है- बीस हजार करोड़ रुपए! फिर भी गंगा मैली और भयावह स्तर पर प्रदूषित है. उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल- ये वे पांच राज्य हैं जिनसे होकर गंगा बहती है. लेकिन इनके प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की चरमराई हालत किसी से छिपी नहीं है.

सरकारी रिपोर्टें के अनुमान बताते हैं गोमुख से लेकर गंगा सागर तक, गंगा के ढाई हजार किलोमीटर के सफर में एक अरब लीटर सीवेज उसमें मिल जाता है. घरेलू और औद्योगिक कचरा जो है सो अलग. गंगा के पानी की गुणवत्ता का पैमाना बताता है कि उसमें डिजॉल्व ऑक्सीजन की मात्रा छह मिलीग्राम प्रति लीटर से कम नहीं होनी चाहिए. दूसरा सूचकांक बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड का है. इसे सामान्य रूप से तीन से अधिक नहीं होना चाहिए. लेकिन हरिद्वार और उससे आगे गुणवत्ता के ये आकंड़े हाल के दिनों में चिंताजनक पाए गये हैं.

जिम्मेदारी किसकी?

केंद्र की योजना में सदाशयता बेशक होगी लेकिन यह सवाल तो जरूर पूछना होगा कि आखिर पांच राज्यों से गुजरने वाली गंगा नदी के लिए इतने विशाल बजट के साथ गंगा नदी के किनारों के सौंदर्यीकरण, घाटों के विकास, सीवेज आदि की उचित व्यवस्था, ट्रीटमेंट प्लांटों की पुनर्सक्रियता आदि तो एजेंडे में हैं लेकिन नदी की स्वच्छता को लेकर जो आम जनमानस में जागरूकता आनी चाहिए उसके लिए क्या अभियान में जगह है या नहीं? नमामि गंगे एक धार्मिक अनुष्ठान सा नजर आता है लेकिन इसमें सामाजिक जागरूकता के लिए क्या उपाय हैं यह स्पष्ट नहीं होता. अनुष्ठान है लिहाजा कानून की नकेल भी कस दी जाएगी लेकिन यह नकेल किन पर गिरेगी? क्या आम लोगों पर, क्या उन अति शक्तिशाली संरचनाओं से सुसज्जित संत कही जाने वाली बिरादरी पर या औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर? क्या खनन माफिया या निर्माण माफिया इसके दायरे में आएगा? इस तरह के बहुत से सवाल उभरेंगें.

मान्यताओं के नाम पर खिलवाड़

"नमामि गंगे" का आशय है "गंगा को प्रणाम करता/करती हूं". लेकिन प्रणाम में अंतर्निहित भावना का भी सम्मान हो तो बात बनेगी. नदियों के प्रति नागरिकों की भी जिम्मेदारी और जवाबदेही बनती है. गंगा सिर्फ आचमन, पूजा पाठ, पाप धुलने, शव बहाने और मिथकीय मान्यताओं से निकली आराधनाओं की नदी ही नहीं है. देश की चालीस करोड़ की आबादी वाले एक बहुत बड़े भूभाग की जैव विविधता, आर्थिकी और संस्कृति की पोषक और वाहक भी है. गंगा एक बड़े पारिस्थितिकीय तंत्र की वाहिनी है. और फिर गंगा ही क्यों, किसी भी देश में कोई भी नदी यही काम करती है. हमारे पूर्वजों ने उनकी शुचिता को एक मान्यता से शायद इसलिए जोड़ा होगा कि कम से कम उस नाते ये बची तो रहेंगी लेकिन अफसोस की बात तो यह है कि सबसे ज्यादा खिलवाड़ उन्हीं मान्यताओं के नाम पर देश की नदियों के साथ होता रहा है.

यह भी पढ़ें: कभी राइन पहले बहुत गंदी थी, पर अब यह किसी चंचल शोख हसीं सी है.

मुक्ति की तलाश में गंगा

और सरकारें?! वे करोड़ों अरबों की योजनाएं और धार्मिक कूटनीतियां ले आती हैं लेकिन अपने जन को यह नहीं बताती कि नदी की सफाई क्यों जरूरी है. अगर सरकारी जोर और कानून का दबाव बनाना ही है तो क्यों नहीं दुनिया की उन नदियों से मिसाल ली जाती जो एक दौर में भयावह मलबे से अधिक कुछ नहीं थी. जैसे ब्रिटेन की टेम्स और जर्मनी की राइन जैसी नदियां. इन नदियों को पुनर्जीवित करने में कोई आचमन, कोई मंत्र, कोई अनुष्ठान काम नहीं आया. काम आई तो एक चिंता, एक जद्दोजहद और एक ईमानदार कामना अपनी नदी को बचाने की. ये नदियां मोक्षदायिनी भले ही न कहलाती हों लेकिन इनके पास जब आप जाते हैं तो वो अहसास अवर्णनीय है. चित्त को शांत करने वाला इतना साफ और पारदर्शी पानी इनमें बहता है. और उतने ही खूबसूरत इनके तट और तटबंध!

भारत में गंगा नदी को मोक्षदायिनी कहकर बहुत वितंडा किया जा चुका है जबकि इस अद्भुत और जीवनदायिनी नदी को वास्तविक मुक्ति की तलाश है. गंगा ही अगर न रही तो फिर किसे प्रणाम.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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