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जर्मन चुनाव

अधिकारों के लिए लड़ते भारत के विकलांग

भारत में विकलांगों के हक के लिए लड़ रहे गुट एक नए कानून की मांग कर रहे हैं जिससे इन्हें और राजनीतिक और सामाजिक अधिकार मिले. वे चाहते हैं कि सरकार विकलांग की परिभाषा को और व्यापक बनाए.

शिवानी गुप्ता सलाहकार हैं और एक कार दुर्घटना में उन्होंने अपने हाथ और पैरों की शक्ति खो दी. अब वह व्हीलचेयर के सहारे हर जगह जाती हैं. शिवानी ने तय किया कि वह दुनिया से सम्मान तो चाहती ही हैं लेकिन यह भी चाहती हैं कि सब उन्हें स्वीकार करें. अपने विकलांग होने के बावजूद गुप्ता और विकलांगों की मदद करना चाहती हैं, "विकलांग होने का मतलब नहीं कि आप सबका अहसान लें. यह विकास का मुद्दा है और सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही. यह बहुत ही निराशाजनक है.

अधिकार और स्वीकृति

भारत में मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग लोगों को रोजाना किसी न किसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है. वे एक विधेयक के लिए मुहिम चला रहे हैं जिससे उनकी जिंदगी बेहतर हो सके.
2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब दो करोड़ 60 लाख विकलांग हैं. हालांकि गैरसरकारी संगठनों के मुताबिक इनकी संख्या बढ़ी है और यह छह और सात करोड़ के बीच हैं. जावेद आबीदी विकलांग अधिकार ग्रुप के प्रमुख हैं वह कहते हैं कि विकलांगों को देश के बाकी नागरिकों की तरह देखा जाना चाहिए. उन्हें अहसानों की जरूरत नहीं. आबीदी को स्पाइना बीफिडा नाम की बीमारी है. 15 साल की उम्र से वह व्हीलचेयर से बंधे हुए हैं.
केवल बीमारी नहीं है

विकलांग बिल इस वक्त संसद में फंसा है. वह इस वक्त विकलांग की परिभाषा को बढ़ाकर सिकेल सेल एनीमिया, थेलेसेमिया और मस्कुलर डिस्ट्रोफी जैसी बीमारियों को शामिल करना चाहता है, जिससे मरीजों को खासी परेशानी होती है. ऑटिज्म, अंधापन, सेरेब्रल पैलसी और तंत्रिका संबंधी बीमारियों को विकलांगता की परिभाषा में लाने की बात चल रही है.
साथ में विधेयक के जरिए कोशिश की जा रही है कि सार्वजनिक क्षेत्र में विकलांगों के लिए तीन से पांच प्रतिशत पद आरक्षित किए जाएं और विश्वविद्यालयों में भी उनके लिए आरक्षण हो. साथ ही सारी इमारतों को विकलांगों के लिए बनाने की जरूरत है. लेकिन नई सरकार बनने तक विधेयक पास होने के आसार नहीं हैं. अगर बिल पारित होता है तो राष्ट्रीय विकलांग आयोग न केवल निदेश जारी करेगा बल्कि उन्हें लागू भी करवाएगा. इन पर अमल न करने वालों पर भारी जुर्माना लग सकता है.


दिल्ली के छात्र प्रताप कुमार का कहना है, "हम चाहते हैं कि सरकार विकलांगता की परिभाषा को बढ़ाए. वह केवल शारीरिक और मानसिक क्षतियों तक सीमित नहीं रहे बल्कि सामाजिक पहचान और सशक्तिकरण को भी ध्यान में रखे."
विकलांगों के लिए सही माहौल बनाने पर अब भी काम नहीं किया जा रहा है. देश भर में मेट्रो स्टेशन भी इस तरह नहीं बनाए गए हैं कि वे आराम से सफर कर सकें. इसलिए उन्हें घर पर रहना पड़ता है. शिवानी गुप्ता कहती हैं, "पार्क, बिल्डिंग या यात्रा पर जाने के बारे में सोच ही नहीं सकते. बिना परेशानी के इधर उधर जाना विकलांगों का हक है. कानून बनाने वालों में मानसिकता को बदलने की कोशिश करनी होगी, आर्किटेक्टों और डिजाइन करने वालों में भी."

अक्टूबर 2007 में भारत ने विकलांग लोगों के अधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए थे. यह पुराने मॉडल से नए सामाजिक मॉडल की ओर बढ़ने की बात करता है और विकलांगों के अधिकारों को बढ़ावा देता है.

रिपोर्टः मुरली कृष्णन/एमजी

संपादनः ए जमाल

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