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ब्लॉग

अधिकारियों के तबादले और सत्ता की हनक

उत्तर प्रदेश में महिला पुलिस अधिकारी से लेकर तेलंगाना में एक महिला कलेक्टर के तबादलों तक, एक बार फिर ये स्पष्ट हो गया है कि सत्ता राजनीति की हनक के आगे सब बेबस हैं.

ईमानदार अधिकारियों को सत्ता के दबंगों के सामने चुनौतीपूर्ण हालात में काम करना पड़ता है. इसका असर सिस्टम पर भी पड़ता है और अधिकारी उदासीन होते जाते हैं. समाज में दबंगों और अपराधियों की पौ बारह हो जाती है. तबादले कोई अनहोनी या नाइंसाफी नहीं हैं और सेवा शर्तों में उनका उल्लेख है. लेकिन वे तब हैरानी और अफसोस बढ़ाते हैं जब हम देखते हैं कि उनके पीछे असली मंशा क्या है. यूपी के बुलंदशहर की एक पुलिस अधिकारी श्रेष्ठा ठाकुर ने शहर में ट्रैफिक नियमों को तोड़ने के आरोप में कुछ बीजेपी नेताओं को लताड़ लगा कर जुर्माना कर दिया था. महिला अधिकारी की फटकार से तिलमिलाए नेताओं ने शिकायत कर दी. इस तरह नयी पोस्टिंग पर जाने वाली ठाकुर, पहली अधिकारी नहीं हैं. रॉबर्ट वडरा जमीन मामले में जांच कर चुके अशोक खेमका जैसे सीनियर आईएएस तो अब इस मामले में कमोबेश किंवदंती ही बन चुके हैं, 23-24 साल के करियर में जिनके 45 तबादले हो चुके हैं. तेलंगाना के नवगठित पेड्डपल्ली जिले की सबसे पहली कलेक्टर बनाई गईं डॉक्टर वीएस अलगु वर्षिणी को पिछले महीने वहां से हटा कर मुख्यालय अटैच कर दिया गया. उनका सत्ताधारी टीआरएस के कुछ नेताओं की आंख की किरकिरी बन जाने की खबरें थीं. पिछले दिनों सहारनपुर के एसएसपी पर हिंदूवादी भीड़ का हमला और उनका तबादला कोई भूला नहीं है. यूपी के पुलिस अधिकारी अमिताभ ठाकुर 24 साल के करियर मे 24 तबादले झेल चुके हैं. मानो तबादले ही इन अधिकारियों की कर्मठता के प्रमाणपत्र बन गए हैं. पिछले ही साल मई में मध्य प्रदेश के बरवानी जिले के कलेक्टर अजय सिंह गंगवार को पद से हटना पड़ा. उन्होंने फेसबुक में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तारीफ की थी!

Twitter Screenshot Ashok Khemka, IAS (twitter.com/AshokKhemka_IAS)

अशोक खेमका

मनमोहन राज के दौरान 2013 में सीबीआई ने पूर्व कोयला सचिव पीसी पारीख के खिलाफ ही एफआईआर करा दी. पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम ने विरोध में बयान जारी कहते हुए यहां तक कह दिया कि फिर तो उन पर भी मामला चलना चाहिए क्योंकि अपने कार्यकाल में उन्होंने व्यापार जगत के कई लोगों से मुलाकातें की थीं. गुजरात के पूर्व पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट का नाम कैसे भुलाया जा सकता है जिन्हें 2002 दंगों के खिलाफ अपनी प्रोएक्टिव भूमिका के चलते न सिर्फ सरकार की कार्रवाई बल्कि कोर्ट के ताने सहने पड़े. ये कुछ मिसालें हैं, ये किसी एक या दो या तीन राज्यों की बात नहीं, कमोबेश सभी राज्यों में अघोषित सी ये परिपाटी दिखती है. अधिकारी मनमानी रोकें तो मुश्किल, दबंगों को ठिकाने लगाएं तो मुश्किल, कानून और व्यवस्था बहाल रखने की कोशिश करें तो मुश्किल.

वैसे अफसरशाहों पर भ्रष्टाचार और सत्ता राजनीति से मिलीभगत के आरोप लगते रहे हैं, भ्रष्ट अफसरों की घटनाएं सामने आती रही हैं. भारतीय सिविल सेवा का ढांचा, इतना बेदाग तो नहीं है. गड़बड़ियां हैं लेकिन इसमें भी इसकी धुरी असल में वो सत्ता व्यवस्था ही है जो चाटुकारों, भ्रष्टों, घूसखोरों और नियम तोड़ने वालों का एक ऐसा घेरा तैयार करती रहती है जो उसकी वासना और विलासिता को महफूज रख सके. इसी सिस्टम से और इस घेरे को तोड़ने का दुस्साहस करने वाले कुछ अधिकारी होते हैं लेकिन नागरिकों को जब तक उनकी इस मेहनत का फायदा मिले, उससे पहले ही उनका ट्रांसफर लेटर आ जाता है. दुबके हुए दबंग, उभर आते हैं और नागरिक जीवन में खलबली फिर से रहने आ जाती है.

अक्टूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने तबादलों से पुलिस अधिकारियों की नैतिकता और प्रदर्शन पर पड़ रहे असर को समझते हुए केंद्र और राज्यों को एक सिविल सर्विसेस बोर्ड (सीएसबी) गठित करने को कहा था जो ट्रांसफर, पोस्टिंग, इनक्वायरी, प्रमोशन, ईनाम, दंड, अनुशासनात्मक कार्रवाई आदि के मामलों को देखेगा. 2014 में सरकार ने आईएएस, आईपीएस और वन सेवा से जुड़े नियमों में संशोधन करते हुए एक पद पर कम से कम दो साल का कार्यकाल का प्रावधान रखा और ये भी कहा कि सीएसबी की संस्तुति के बगैर दो साल से पहले ही तबादला नहीं होगा. लेकिन नियम अपनी जगह रह गए.

Indien Amitabh Thakur (UNI)

अमिताभ ठाकुर

प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादलों की दर में इधर तेजी आई है और तबादलों के सापेक्ष अपराध की दर भी बढ़ी है. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डेवलेपमेंट (बीपीआरडी) के एक आकलन के मुताबिक 2006 से 2015 की दस साल की अवधि में, पुलिस अधिकारियों के तबादलों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे अव्वल था. भारतीय औसत से चार गुना अधिक तबादले अकेले इस राज्य में हुए हैं. एक पुलिस अधिकारी अपने पद पर औसतन एक साल से भी कम टिका. इसी दौरान अपराध की दर भी दोगुना हुई. संज्ञेय अपराधों की संख्या 2006 में करीब एक लाख 22 हजार से बढ़कर 2015 में दो लाख 42 हजार के करीब हो गई. 2010 से 2015 के दौरान सांप्रदायिक अपराध में पांच गुना उछाल देखा गया. समस्त भारतीय आईपीएस कैडर का 11 फीसदी उत्तर प्रदेश में है. 2007 से 2015 के दौरान 2251 बार पुलिस अधिकारियों के तबादले हुए. दूसरे नंबर पर तमिलनाडु है, जहां इस अवधि में 453 तबादले हुए.

क्या ये अधिकारी इतने बड़े पैमाने पर नाकाम और सुस्त हैं कि उन्हें एक साल के भीतर ही चलता कर दिया जाता है या बात कुछ और है जिसका संबंध पावर पॉलिटिक्स से है. कमोबेश सभी छोटे बड़े राज्य इसके शिकार हैं. तबादले लो या तोहफे. भारतीय सिविल सेवा इस विडंबना से जूझ रही हैं. जब भी सरकार बदलती है, या सरकार का मुखिया बदलता है तो पसंदीदा प्रशासनिक चेहरे सत्ता के कॉरीडोर में अगली पंक्ति में आ जाते हैं. यही वो अदृश्य गली है जो सत्ता राजनीति को अफसरशाही से जोड़ती है. अदृश्य ‘नेता-अफसर गठजोड़' यहीं पर पनपता है जो आगे चलकर "ठेकेदार, विभिन्न माफिया, दलाल आदि को लेकर एक अदृश्य ‘महागठजोड़' बनता जाता है. जब ये नेक्सस टूटेगा तभी खुली हवा में सांस ले पाएंगें. राजनैतिक विवेक और इच्छाशक्ति ही इसे तोड़ने का अंतिम उपाय है, भले ही ये महज एक नैतिक दुहाई जैसा दिखने लगा हो.

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