अतीत से सुलह का मुश्किल रास्ता | दुनिया | DW | 14.08.2015
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दुनिया

अतीत से सुलह का मुश्किल रास्ता

दूसरे विश्व युद्ध के 7 दशक बाद भी जापान को अपने युद्धकाल के इतिहास से आगे बढ़ पाने में मुश्किल होती है. जापान इस मामले में समान प्रक्रिया से गुजरे जर्मनी से बहुत अलग है,

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2 सितंबर 1945 को जापान का आत्मसमर्पण

क्या जापान ने दूसरे विश्व युद्ध में अपनी हार और गहरी पीड़ा झेलकर भी कोई सबक नहीं सीखा है? हाल के सालों में वहीं बढ़ती राष्ट्रवादी भावना और देश के इतिहास को बदलने की कोशिशों से इस तरह के संदेह उभर कर सामने आते हैं.

प्रधानमंत्री शिंजो आबे के बयान और काम इसी मत को बल दे रहे हैं. उन्होंने युद्ध अपराधों के लिए अपने पूर्ववर्तियों द्वारा मांगी गई माफी से दूरी बनाई है और कुछ दूसरे जापानी प्रधानमंत्रियों की तरह ही आबे ने भी विवादास्पद यासुकुनी समाधि का दौरा किया, जहां कई सजायाफ्ता युद्ध अपराधियों समेत युद्ध में देश के लिए मारे गए जापानी लोगों की समाधि है.

आम सहमति नहीं

प्रधानमंत्री आबे और उनके कुछ सहयोगियों की स्पष्ट राष्ट्रवादिता से युद्धकाल के अतीत के प्रति जापानी समाज के रवैए के जटिल सत्य की सही तस्वीर नहीं दिखती है. जापान को समझने वाले विशेषज्ञ सरकार की "स्मृतियों वाली राजनीति" और सामाजिक संवाद के बीच लगातार पड़ती फूट की ओर इशारा करते हैं.

बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के इतिहासकार सेबास्चियन कोनराड बताते हैं, "जापान में युद्धकाल के अतीत को याद करने का पूरा मुद्दा काफी विवादित है, क्योंकि इसमें कई तरह के मकसद और हित जु़ड़े थे." इस विषय पर जापान की स्थिति जर्मनी से काफी अलग हैं. जर्मन सरकार, संसद और जनता के विशाल बहुमत की इस पर एक सी राय है.

'सफलता के लिए दोनों पक्षों का सहयोग जरूरी'

युद्ध के बाद से जापान की सरकारों की राय रही है कि देश ने आर्थिक मदद एवं मुआवजे के लिए प्रावधान बना कर युद्ध अपराधों और लूटपाट की पर्याप्त जिम्मेदारी ली है. लोगों के बीच मेलजोल बढ़ाने के लिए दक्षिण कोरिया के साथ स्कूल की साझा किताबों जैसे कई अभियान जरूर चलाए गए, लेकिन जर्मनी के हाले-विटेनबेर्ग युनिवर्सिटी की जापान विशेषज्ञ गेजीने फोलियांटी बताती हैं कि "यह पहल राजनीतिज्ञों की तरफ से नहीं हुई."

एशिया विशेषज्ञ ईयान बुरुमा कहते हैं कि जापान अपने एशियाई पड़ोसियों के साथ कुछ स्टूडेंट-एक्सचेंज कार्यक्रम भी चलाता है, हालांकि यूरोप के मुकाबले काफी छोटे पैमाने पर. बुरुमा के अनुसार, "ऐसे किसी भी अभियान को सफल बनाने के लिए दोनों पक्षों के सहयोग की जरूरत होती है. चीनी और कोरियाई लोगों को भी इसके लिए ग्रहणशील होना जरूरी है, जैसा कि हमेशा नहीं होता."

वाइत्सेकर भाषण

सन् 1949 में जब जर्मनी का संविधान "ग्रुंडगेजेत्स" पास किया जा रहा था, तो एफडीपी सदस्य और बाद में जर्मनी के राष्ट्रपति बनने वाले थियोडोर हॉएस ने कहा था कि 8 मई 1945 को जर्मनी एक ही साथ बर्बाद और आजाद हुआ था. इन शब्दों से पता चलता है कि देश की सैनिक हार के बारे में दोहरी राय काफी पहले से रही है. राष्ट्रपति रिचर्ड फॉन वाइत्सेकर के 1985 के उस प्रसिद्ध भाषण से बहुत पहले जिसमें उन्होंने उस तारीख को "आजादी का दिन" बताया था.

Deutschland Geschichte Kapitel 4 1979 – 1989 Richard von Weizsäcker Rede im Bundestag

रिचर्ड फॉन वाइत्सेकर का 1985 का प्रसिद्ध भाषण

वाइत्सेकर के भाषण की जापान में भी काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई थी. कोनराड बताते हैं, "उसे कई रूपों में अपनाया गया. अनुवाद हुए, प्रकाशन हुआ और भाषण के दो साल बाद तक नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले कई कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी उसके उद्धरण देते रहे, जिससे जापानी सरकार को भी और ज्यादा सार्वजनिक स्वीकार्यता के लिए प्रेरित किया जा सके."

इतिहासकार बुरुमा बताते हैं कि युद्धकाल के अतीत पर ऐसा दोहरा मत रखने की जापान से उम्मीद बेकार थी क्योंकि "एक तो युद्ध के इतिहास की पूरी तरह जर्मन इतिहास से तुलना नहीं की जा सकती. दूसरे, ऐसा कोई जापानी हिटलर नहीं हुआ था, ना ही कोई नाजी पार्टी थी. जापान ने एशिया में पश्चिमी सत्ताओं के विरूद्ध युद्ध लड़ा था."

क्षमायाचना का रास्ता

अमेरिका के लिए युद्ध अपराध न्यायालयों में प्रमुख राजनीतिक और सैनिक नेताओं की सजा के साथ काम पूरा हो गया. अमेरिका को अब शीतयुद्ध में नए साथियों की जरूरत थी. शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद जापानी सरकारों ने स्वनिंदा का रास्ता इख्तियार किया और वहीं से 1995 में दूसरे विश्वयुद्ध की 50वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्रियों द्वारा सार्वजनिक माफी मांगने का सिलसिला शुरु हुआ. हालांकि यह कदम उतने प्रतीकात्मक साबित नहीं हुए जितनी जर्मन चांसलर विली ब्रांट की वारसॉ वाली क्षमायाचना. कोनराड बताते हैं कि शायद वह इतनी स्वाभाविक नहीं थी और इसी कारण वैसा प्रभाव नहीं डाल पाई.

विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि तबसे जापान में माहौल जरूर बदला है. संसद और सरकार में राष्ट्रवादी समूहों ने देश की युद्धकाल के अतीत की व्याख्या की नई कहानी रचने का प्रयास किया है. पूर्वी चीन सागर के विवाद पर चीन के मुखर रुख और दूसरे पड़ोसी देशों के साथ ऐसे ही कुछ विवादों को देखते हुए जापान में राष्ट्रवादी प्रवृत्तियां फिर से उभरती दिख रही हैं.

हंस श्प्रौस/आरआर

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