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विज्ञान

अजीबो गरीब मालिश

केरल की आयुर्वेदिक मसाज के बाद दुनिया भर में थाई मालिश बेहद लोकप्रिय है. लेकिन यही मसाज यदि कोई हाथी दे तो कैसा लगेगा? थाईलैंड के शहर पटाया में आजकल पर्यटक इस नए प्रकार की मसाज का लुत्फ उठा रहे हैं.

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इस मालिश के लिए आप को सिर्फ एक चटाई या चादर ले कर आना होता है और बाकी की आपकी सेवा गजराज खुद ही कर लेंगे. अमूमन एक हाथी करीब दो टन भारी होता है. इस मसाज के लिए इन हाथियों को ख़ास तौर से तैयार किया गया है. उन्हें कुछ इस तरह से प्रशिक्षित किया गया है कि वे अपने पैरों और अपनी सूंड से धीरे धीरे आपके शरीर को मसाज दें.

बुद्धिमान गजराज

जर्मनी के बोडो येंस फोएर्स्टर उत्तरी थाईलैंड में हाथियों को प्रशिक्षण देते हैं और उनके लिए एक कैम्प चलाते हैं. उनका मानना है कि हाथी एक बेहद समझदार जीव है. "हाथी करीब चालीस प्रकार के निर्देश समझ सकते हैं. वे 80 से 100 प्रकार के वाक्यों को भी समझ सकते हैं. इतना ही नहीं, वे आइने में खुद को देख कर पहचान भी सकते हैं. बंदर और डॉल्फिन के बाद हाथी ही हैं जिनमें इतनी बुद्धि पाई गई है." फोएर्स्टर के कैम्प में पर्यटक हाथियों के साथ फुटबॉल भी खेल सकते हैं और उन्हें खाना भी खिला सकते हैं. उनका कहना है कि ज़रूरी यह है कि किसी तरह हाथियो को रोज़गार मिल सके. पर्यटक उन्हें देख कर खुश होते है और उनका मनोरंजन कर के हाथी कुछ पैसे कमा लेते हैं.

Elefanten Tag in Thailand

थाईलैंड में हाथी समाज का अभिन्न अंग...

मसाज और खेलने के अलावा थाईलैंड में हाथिओं को और भी कई तरह के प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं. इनमें सबसे दिलचस्प है चित्रकारी. पटाया के नोंग नूच गार्डन में इन्हें टी-शर्ट पर अलग अलग तरह के डिज़ाइन बनाते हुए देखा जा सकता है. कोई हाथी ब्रश ले कर शर्ट पर दिल बनाता है तो कोई 'लव' लिखता है. लोग इन शर्टों को 350 बाहत यानी 500 रूपए में खरीद सकते हैं.

हाथियों को रोजगार

जहां लोग हाथियों के इन अनोखे कारनामों के मजे ले रहे हैं, वहीं इससे हाथियों को भी फायदा भी मिल रहा है. इसे उनके लिए रोज़गार के एक अवसर की तरह देखा जा रहा है. थाईलैंड में लम्बे समय से हाथियों का प्रयोग पेड़ गिरा कर जंगलों को साफ करने के लिए किया जाता रहा है. इसी काम के लिए कई दशकों पहले हाथियों को जंगलों से निकाल कर शहर लाया गया था और खास तौर से प्रेरित किया गया था. लेकिन 1989 में थाईलैंड में पेड़ों के गिराने पर रोक लगा दी गई और इसी के साथ ये हाथी भी बेरोजगार हो गए. पिछले बीस सालों से यह चिंता का विषय बना हुआ था कि अब इन हाथियों के साथ करना क्या है. इन्हें दोबारा जंगलों में भेजना मुमकिन नहीं था क्योंकि इन्होंने अपने आप को शहरों के हिसाब से ढाल लिया था. भारत की ही तरह यहां भी इन्हें सैलानियों के सैर सपाटे के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा. साथ ही हाथियों की थाई समाज में वही जगह है जो गाय की हिन्दू धर्म में है. धार्मिक भावनाओं से जुड़े होने के कारण भी उनके लिए कोई दूसरा काम ढूंढना आसान नहीं था.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा

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