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ताना बाना

अक्षर की दुनिया में आगे बढ़ती महिलाएं

हर साल अक्टूबर में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर मे पुस्तक मेला होता है. ताकि यह बात भुला न दी जाए कि दुनिया में करोड़ों लोग लिखना पढ़ना नहीं जानते हैं, हर साल लिटकैम यानी लिटरेचर कैंपेन नाम का अभियान छेड़ा जाता है.

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दुनिया में करीब 80 करोड़ लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं. उनमें से दो तिहाई यानी 75 प्रतिशत महिलाएं हैं. दिलचस्प बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर अनपढ़ महिलाएं 12 देशों में रहतीं हैं. इन देशों में कई अफ्रीकी देश हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान जैसे देश भी शामिल हैं. लाटविया की वायरा विके फ्रायबर्गा यूरोपीय संघ की विशेष दूत हैं. उनका मानना है कि इसका कारण गरीबी है. लेकिन कई और कारण भी हैं.

खासकर अफ्रीका में हमे यह देखने को मिलता है कि वहां पर महिलाएं इस लिए भी पढना लिखना नहीं जानते हैं, क्योंकि वहां शांति नहीं है. अगर एक देश में लगातर गृहयुद्ध चल रहा हो, हिंसा चल रही हो जैसा कि दक्षिण अमेरिकी देश कलंबिया में भी देखने को मिल रहा है तब इस सब के बीच महिलाएं ही सबसे ज़्यादा पिसतीं हैं. - वायरा विके फ्रायबर्गा

Frankfurter Buchmesse Jorge Luis Borges Flash-Galerie

गृहयुद्ध या हिंसक विवादों के चलते यह देखा गया है कि स्कूल नष्ट हो जाते है. रोजगार के अवसर कम होने के कारण अकसर यह भी देखा गया है कि लड़कों की शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. यह रूढ़िवादी सोच भारत में भी देखी जा सकती है जहां ग्रामीण इलाकों में माना जाता है कि लड़कियां तो शादी के बाद दूसरे घर में चली जाती हैं और मर्द ही घर चलाते हैं. कारीन प्लोएत्स लिटकैम प्रॉजेक्ट की निर्देशक हैं. 2006 में इस प्रॉजेक्ट की शुरुआत हुई. वे कहतीं हैं कि प्रॉजेक्ट के तहत संयुक्त राष्ट्र की मदद से दुनियाभर में राजनितिज्ञों, मीडिया और बड़ी हस्तियों को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश की जा रही है. कारीन प्लोएत्स कहतीं हैं.

समस्या यह है कि वैश्विकरण के दौड़ में तकनीक के विकास की वजह से शिक्षा पाए बिना संभव ही नहीं है कि कोई चुनावों में वोट दें या समझे कि समाजिक गतिविधियां क्या हैं. ऐसा व्यक्ति अखबार नहीं पड सकता है, अपनी राय नहीं बना सकता है और ऐसे में वह अलग थलग हो जाता है. खासकर महिलाओं के लिए यह भी ज़रूरी है कि वह समझे कि उनके अधिकार क्या है. लेकिन शिक्षा के अभाव की वजह से वह अपने अधिकारों के पालन की भी मांग नहीं कर पातीं हैं. - कारीन प्लोएत्स

वैसे कारीन प्लोएत्स इस बात पर ज़ोर देतीं हैं कि यह सिर्फ विकासशील देशों की समस्या नहीं है.

जर्मनी की 8 करोड 20 लाख की आबादी में से भी 40 लाख लोग पढना लिखना नहीं जानते हैं. हर साल 60 000 युवा स्कूल बिना डिग्री लिए छोड़ते हैं. और उनमें से भी कइयों को पढ़ने लिखने में दिक्कत होती है. - कारीन प्लोएत्स

पढना और लिखना नहीं जानना आज भी समाज में एक ऐसी चीज़ है जिसपर बात नहीं की जाती है, जिसको लेकर खासकर महिलाओँ के अंदर शर्म की भावना रहती है.

रिपोर्ट: प्रिया एसेलबोर्न

संपादन: उज्ज्वल भट्टाचार्य

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