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विज्ञान

अक्षय ऊर्जा में अगुआ बना जर्मनी

जर्मनी दुनिया की पहली ऐसी अर्थव्यवस्था बन गया है जिसे पूरे विश्व में आधुनिक ऊर्जा का मॉडल राष्ट्र कहा जा सकता है. जर्मनी फिलहाल अपनी कुल बिजली का करीब 29 फीसदी अक्षय ऊर्जा स्रोतों से तैयार करता है.

ऊर्जा के अक्षय स्रोत हैं सूरज की रोशनी, पानी की शक्ति या हवा से चलने वाली पवन चक्कियां. जर्मनी ने बहुत पहले से इन स्रोतों के इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश शुरू कर दी थी. एक ताजा सर्वेक्षण से पता चलता है कि जर्मनी की करीब दो-तिहाई औद्योगिक इकाईयां अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का कम से कम कुछ हिस्सा फोटोवोल्टेइक सेलों से तैयार करने की योजना बना रही हैं. फोटोवोल्टेइक पैनल बनाने के मामले में जर्मनी दुनिया में अगुआ है और उसे आकर्षक दाम पर उपलब्ध कराने में भी सफलता पाई है.

वैकल्पिक ऊर्जा में सबसे आगे

फोटोवोल्टेइक पैनलों के ऑर्डर केवल जर्मनी ही नहीं बल्कि इटली और स्पेन जैसे कई दूसरे यूरोपीय देशों से भी बढ़े हैं. 2003 में इससे होने वाले ऊर्जा उत्पादन की कीमत प्रति किलोवॉट 5 यूरो तक पड़ती थी जो 2013 में सस्ती होकर करीब 0.7 यूरो ही रह गई है.

राजधानी बर्लिन के आसपास का क्षेत्र ब्रांडेनबुर्ग तो इस मामले में एक मिसाल कायम कर चुका है. यहां इस्तेमाल होने वाली कुल बिजली का करीब 78 फीसदी पवन चक्कियों, फोटोवोल्टेइक पैनलों या बायोमास से ही पैदा किया जाता है. ब्रांडेनबुर्ग का उदाहरण अपने आप में इस वजह से भी खास है कि इस इलाके में पनबिजली पैदा करने के ज्यादा साधन नहीं हैं. इसके बावजूद जल्दी ही वह अक्षय स्रोतों से इतनी ऊर्जा बना रहा होगा कि दूसरों को बेचने लगे.

क्या होगी सारी जरूरत पूरी

अक्सर इस बात को लेकर शंका जताई जाती है कि क्या वाकई ऊर्जा की सारी जरूरतों तो अक्षय स्रोतों से पूरा किया जाना संभव है. पारंपरिक धारणा यह रही है कि अक्षय ऊर्जा के साथ हमेशा फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता रहेगी. उदाहरण के लिए, पवन चक्कियां तभी बिजली बनाएंगी जब वाकई हवा चल रही हो या फिर फोटोवोल्टेइक पैनल ऊर्जा उत्पादन के लिए सूरज की रोशनी पर निर्भर है. ऐसे में पवन या सौर ऊर्जा के अलावा किसी ना किसी तरह के दूसरे ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करना ही होगा. मगर ब्रांडेनबुर्ग और उसके जैसे कुछ और जर्मन राज्यों ने इस धारणा को गलत साबित करते हुए दिखा दिया है कि ऐसी स्थिति में बायोमास ऊर्जा काम में लाई जा सकती है.

जर्मनी कैसे आया सबसे आगे

साल 2000 में जर्मनी में लागू हुए अक्षय ऊर्जा अधिनियम के कारण एक क्रांतिकारी बदलाव आया. इस नए अधिनियम में फीड-इन-टैरिफ गारंटी नीति लाई गई जिसके अनुसार पवन और सौर ऊर्जा का उत्पादन करने वालों को ऊर्जा की तय कीमत मिलने की गारंटी मिली. नतीजा इतना सकारात्मक था कि तबसे लेकर साल 2013 आते-आते, जर्मनी में स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 114 से बढ़कर 36,000 मेगावॉट और पवन ऊर्जा क्षमता 6,000 से बढ़कर 35,000 मेगावॉट तक पहुंच गई. आधिकारिक योजना कुल ऊर्जा में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी को 2020 तक 35 फीसदी तक और 2050 तक करीब 80 फीसदी तक बढ़ाने की है.

आरआर/एमजे(आईपीएस)

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