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विज्ञान

अकेलेपन की बीमारी है बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर

दुनिया की भीड़ में मैं ही अकेला क्यों हूं. ऐसे ख्यालों से जूझते लोग हमारे आसपास खूब मिलते हैं. सामान्य दिखने वाले ये लोग दरअसल मरीज हैं जिन्हें बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर ने अपने घेरे में जकड़ रखा है.

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भले ही लोग इसे अपनी तन्हाई, किस्मत, बेबसी समझें पर है ये बीमारी ही. दिल्ली के मशहूर मनोविज्ञानी संजय चुग बताते हैं, "बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर में आपके सामाजिक रिश्तों पर बहुत असर पड़ता है, आपको आपके भीतर बहुत ज्यादा हीन भावना महसूस होती है आपका मूड में बहुत इन्स्टेबिलिटी होती है, कभी आपको बहुत गुस्सा आ जाता है, कभी बहुत उत्तेजना होती है कभी बहुत उदासी होती है. "

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस बीमारी को दो रूपों में बांटा है पहला है इम्पल्सिव और दूसरा बॉर्डरलाइन. इम्पल्सिव मरीज में अचानक हरकत में आ जाने की आदत होती है, वो असहमतियों पर झगड़ा करते हैं, गुस्से में आंखें तरेरते हैं और कई बार हिंसक भी हो जाते हैं, तुरंत फायदा ना दिखे तो काम हाथ में नहीं लेते और इनका मन एक जगह टिक कर नहीं रहता.

बॉर्डरलाइन वाले मरीज अपनी छवि, अभिरुचियां जिनमें सेक्स भी शामिल है और लक्ष्यों को लेकर उहापोह की स्थिति में रहते हैं. कोई रिश्ता कहीं गहरा हो जाए या फिर एकदम कच्चा ही ना निकल जाए इसे लेकर इनके अंदर भावनाएं बहुत उठापटक मचाती हैं. कोई इन्हें छोड़ न दे इसके लिए पूरी जान लगा देते हैं और इसके लिए कई बार खुद को नुकसान भी पहुंचा लेते हैं लंबे समय तक खुद को अकेला और खाली महसूस करते हैं.

मुश्किल ये है कि लोग इसे आमतौर पर बीमारी नहीं समझते ना ही इलाज की जरूरत महसूस होती है पर सचमुच अगर इलाज ना हुआ तो इसके खतरनाक नतीजे भी हो सकते हैं. संजय चुग कहते हैं, " रोजमर्रा की ज़िंदगी में तो इस बीमारी के गंभीर परिणाम होते ही है क्योंकि कभी भी आप किसी संबंध में सामान्य नहीं रह सकते. ऐसे में आपके जीवन से खुशियां दूर हो जाती हैं क्योंकि जीवन में खुशियां तो रिश्तों से ही आती है."

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर से जूझने वाले लोगों में अपनी पहचान को लेकर निराशा होती है. उन्हें लगता है कि उन्हे कोई जानता ही नहीं. सैकड़ों लोगों की भीड़ में भी वो खुद को अकेला महसूस करते हैं और भीड़ का हिस्सा बनने से बचना चाहते हैं. कई बार उन्हें ये भी महसूस होता है कि वो चाहकर भी लोगों से घुलमिल नहीं पा रहे हैं. समझते हैं कि दुनिया उनसे दूर जा रही है.

ऐसा भी नहीं कि वो इस स्थिती को अपना हासिल समझकर खामोश बैठ जाएं. अंदर की बेचैनी उन्हें शांत नहीं रहने देती और वो इससे बाहर निकलने के लिए लगातार मचलते रहते हैं. इस बेचैनी में दूसरों पर दबाव डालने की भी कोशिश होती है.

"कई बार लड़का या लड़की दूसरे को प्रभावित करने के लिए आत्महत्या की धमकी देते हैं या ऐसे में कई बार अंदाजा सही न होने की वजह से शारीरिक नुकसान हो जाता है जैसा नींद की ज्यादा गोलियां खा लेना या कम उंचाई की बजाए ज्यादा उंचाई से छलांग लगा देना."

बीमारी है तो इलाज भी मौजूद है पर वो मेडिकल स्टोर पर नहीं मिलता क्योंकि दवा से ज्यादा रवैये में बदलाव इस पर असर करता है. " बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसॉर्डर के लिए एक ख़ास किस्म की साईकोथरेपी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन अगर मूड्स में डिस्टरबेंस बहुत ज्यादा हो जैसे कि बहुत गुस्सा हो या इंसान काफी भावुक हो जाए तो जरूरत के हिसाब से दवाइयों का प्रयोग किया जाता है."

इस बीमारी के होने की कई वजहें हैं. डॉक्टरों के मुताबिक इंसान में मौजूद जीन्स भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं. वैसे आमतौर पर बचपन में लाड़प्यार में कमी, हिंसा या यौन शोषण इसकी वजह होते हैं.

इस बीमारी से लड़ने में मदद करने वाली संस्था चलाने वाले फ्रैंक माइकल गैन बताते हैं कि ऐसे हालात में इंसान अपनी भावनाओं को दूसरों के सामने रखने की बजाए इंसान उन्हें छिपाने और दबाने लगता है और यहीं से बीमारी की शुरुआत होती है. जिंदगी में सकारात्मक सोच और अपने हासिल पर खुश होकर हालात बदले जा सकते हैं और बीमारी को कहीं दूर फेंका जा सकता है जरूरत सिर्फ एक ईमानदार कोशिश की है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एन रंजन

संपादन: एस गौड़