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दुनिया

अंधेरी सुंरग के दूसरे सिरे रोशनी

ईरान के राष्ट्रपति रोहानी के सत्ता में आने के बाद दूसरी बार हुई बातचीत, जेनेवा परमाणु वार्ता में कोई समझौता नहीं हो सका है. डीडबल्यू के डॉ जमशेद फारुखी मानते हैं कि इस बार इसके लिए ईरान जिम्मेदार नहीं है.

Deutsche Welle Persische Redaktion Jamsheed Faroughi

ईरान विभाग के प्रमुख डॉ जमशेद फारूखी

ईरान के साथ परमाणु मुद्दे पर किसी समझौते का न हो पाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह जरूर नया है कि इसकी जिम्मेदारी ईरान इस बार पर नहीं है. इस बार इस्लामी गणराज्य खेल बिगाड़ने वाले की भूमिका से दूर समझौते के लिए तैयार था.

परमाणु मुद्दे पर विदेश नीति में अचानक ईरान के इस मध्यमार्गी बदलाव को कैसे समझा जा सकता है ? क्या ईरान अब वह पुराना देश नहीं रहा है जो एक दशक तक बुरी खबरों का कारण बना रहा? क्या यह वही देश नहीं है जो महमूद अहमदीनेजाद के नेतृत्व में आक्रामक भाषा और उकसाऊ विदेश नीति के कारण अलग थलग पड़ गया था?

इस सबकी शुरुआत ईरान के राष्ट्रपति चुनावों के साथ हुई. नए राष्ट्रपति हसन रोहानी ने सत्ता में आने के 100 दिन के अंदर ही विश्व समुदाय के लिए सकारात्मक संकेत देने शुरू किए. बातचीत के दौर में ईरान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखने के लिए यह कारण काफी था, लेकिन यह सिर्फ आधी सच्चाई है.

खमेनेई का फैसला ही अंतिम

इसमें कोई शंका नहीं कि सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह अली खमेनेई का फैसला पहले की ही तरह ईरान का आखिरी फैसला होता है और परमाणु विवाद जैसे अहम मुद्दे पर विचारधारा में बदलाव उनकी सहमति के बगैर संभव नहीं. कई साल से अटकी पड़ी परमाणु वार्ता के लिए भी वह कई साल तक अकेले ही जिम्मेदार थे न कि उनके इशारों पर चलने वाले अहमदीनेजाद. अब ऐसा क्या हुआ है कि पुरानी परमाणु नीति को उन्होंने बदल दिया और नए राष्ट्रपति के साथ बिलकुल नई राह पर चल पड़े हैं?

जहां तक ईरान का सवाल है, जवाब तुलनामत्मक रूप से आसान है. उस पर लगे तेल और गैस निर्यात के प्रतिबंध के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार से बहिष्कार का असर हुआ. प्रतिरोध तभी असर करते हैं, जब उनसे तकलीफ हो और उन्होंने ईरान को काफी तकलीफ पहुंचाई.

तेल व्यापार बहुत कम हो गया. इससे मिलने वाला राजस्व 50 फीसदी तक कम हो गया. कच्चे तेल के व्यापार का सबसे बुरा समय 2012 में आया और ईरान को 30 अरब यूरो का नुकसान उठाना पड़ा. 2013 में आर्थिक स्थिति पिछले साल से भी बुरी है.

समय कम

ईरान का 70 फीसदी राजस्व तेल और गैस के निर्यात से आता है, जाहिर है कि उसके लिए तेल प्रतिबंध के नतीजे निश्चित ही गंभीर हैं. ईरानी मुद्रा का तेजी से अवमूल्यन, बेकाबू महंगाई, देश में बढ़ती बेरोजगारी और समाज में युवाओं के सामने विकल्प ना होने के साथ ही बढ़ती असंतुष्टि. इस सबकी वजह से ईरान की नीतियां बदली हैं. परमाणु विवाद में ईरान लंबे समय तक टालमटोल करता रहा. अब रुढ़िवादियों को आखिरकार समझना होगा कि समय उनसे उल्टी दिशा में दौड़ रहा है. कूटनीतिक हल के लिए भी अनिश्चित काल का समय नहीं है.

सभी को यह समझना होगा कि ईरान के साथ परमाणु विवाद का शांतिपूर्ण हल काफी महत्वपूर्ण है. इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचना बातचीत में शामिल सभी धड़ों के लिए अहम है और हर तरह से फायदेमंद भी. छह पक्षीय वार्ता के प्रमुख और ईरान को तेजी से एक समझौते पर काम करना होगा. यह सिर्फ पहला कदम है और लंबी, खतरनाक सुरंग के आखिर में उम्मीद की रोशनी. तब तक का रास्ता पथरीला और मुश्किल है.

सच तो यह है कि ईरान और पश्चिम के नजदीक आने से सभी खुश नहीं है. इसके बिलकुल विपरीत इस समझौते के विरोधी बहुत हैं और हर जगह हैं, ईरान में भी. इसे भूलना नहीं चाहिए.

ईरान में राष्ट्रपति चुनावों के समय से बदलाव की हवा चल रही है, लेकिन इस बदलाव के विरोध में चलने वाली हवाओं की ताकत को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अति रुढ़िवादियों की चुप्पी को उनके समर्थन का संकेत न समझा जाए. बातचीत में होने वाली हर देर, कट्टरपंथ को मजबूत करेंगी. असली काम तो अब शुरू हुआ है.

समीक्षाः जमशेद फारूखी/एएम

संपादनः एन रंजन

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