1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

जर्मन चुनाव

अंतिम दौर में वाराणसी में चुनाव

चुनाव के अंतिम दौर में 12 मई को भारत में तीन प्रदेशों की 41 सीटों पर मतदान हो रहा है. लेकिन केंद्र में वाराणसी का चुनाव है जहां. भाजपा के नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल का मुकाबला हो रहा है.

इस बार वाराणसी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति का केंद्र बन गया है. सो घोषणाओं का मौसम यहाँ पूरे यौवन पर हैं. चुनावी मैदान में उतरे सभी उम्मीदवार मतदाताओं को लुभाने के लिए सपनों का सौदागर बन गए हैं. प्रचार युद्ध में भाजपा सबसे आगे है. पूरा शहर मोदीमय नज़र आता है हालांकि चुनावी मैदान में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा के उम्मीदवार भी ताल ठोक रहे हैं.

आक्रामक प्रचार का सहारा

नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल के चुनावी मैदान में उतरते ही वाराणसी शहर का राजनैतिक तापमान अचानक बढ़ गया है. भाजपा और आम आदमी पार्टी, दोनों ने ही यहां से अपने नेताओं की जीत सुनिश्चित करने के लिए आक्रामक प्रचार शैली को अपनाया है. दोनों ही पार्टियों के हजारों कार्यकर्त्ता देशभर से यहां जमे हुए हैं. अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थक करीब एक महीने से वाराणसी में डेरा डाले हुए हैं. नुक्कड़ सभाओं, छोटी-छोटी मोहल्ला सभाओं के जरिये मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है. आम आदमी पार्टी के मुकाबले भाजपा कार्यकर्ताओं की संख्या ज्यादा है और वे पूरे शहर में फैले हुए हैं. मोदी और केजरीवाल समर्थकों का आमना सामना होने पर कई बार स्थिति तनावपूर्ण भी बन जा रही है. शहरी इलाके में केजरीवाल के समर्थक कम विरोधी ज्यादा हैं. आश्चर्यजनक रूप से इस बार कांग्रेस, बसपा और सपा उम्मीदवार वैसा प्रचार नहीं कर रहे हैं जैसा नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं.

विकास से दूर वाराणसी

हिन्दुओं की पवित्र नगरी वाराणसी लंबे समय से राजनीतिक नेताओं की अनदेखी की शिकार रही है. सभी पार्टियां इसके लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही हैं. भाजपा केंद्र और राज्य सरकार पर शहर की उपेक्षा का करने का आरोप लगा रही है. सालाना लाखों पर्यटक इस शहर में आते है इसके बावजूद यहां मूलभूत सुविधाओं की काफी कमी है.

बिजली, सड़क पानी की समस्या स्थानीय निवासियों के साथ ही पर्यटकों को भी झेलनी पड़ती है. संकरी गलियों और अव्यवस्थित यातायात पर अब तक खास ध्यान नहीं दिया गया है. नलिन पटेल कहते हैं कि इस शहर में हजारों विदेशी सैलानी आते हैं, अगर इसे अंतराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया गया तो शहर के युवाओं को रोजगार मिलेगा.

वाराणसी शिक्षा का एक बड़ा केंद्र है. देश भर से छात्र बीएचयू में पढने आते हैं. बीएचयू के छात्र पंकज सिंह का कहना है कि इतना पुराना शहर होने के बावजूद इस शहर में विकास का सूरज नहीं उग पाया. क्षेत्र में उद्योगों का न होना स्थानीय युवाओं के पलायन का प्रमुख कारण है.

रिवर, वीवर और सीवर

वाराणसी के लिये आम आदमी पार्टी ने ''रिवर, वीवर और सीवर" का नारा दिया है. रिवर यानी गंगा नदी की सफाई, वीवर यानी बुनकरों के कल्याण के लिये काम और सीवर यानी नालों की सफाई का अभियान. बनारसी सिल्क साड़ियां का नाम पूरी दुनिया हैं लेकिन इन्हें बनाने वाले हजारों बुनकर अपने हालात पर आंसू बहा रहे हैं. भाजपा ने भी गंगा नदी और बुनकरों की समस्या को अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल किया है. नरेंद्र मोदी कहते हैं, ''देश के सवा सौ करोड़ लोगों के इतिहास का केंद्र गंगा है. साबरमती नदी को हमने बदल दिया है, गंगा को भी हम साफ करेंगे.''

अरविंद केजरीवाल कहते हैं, “बनारस में गंगा मैली हुई नहीं है, की गई है, यह भ्रष्ट व्यवस्था का नतीजा है. इस व्यवस्था को बदलना पड़ेगा.” वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में बुनकर मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है. आम आदमी पार्टी की ही तरह भाजपा भी बुनकर समुदाय को लुभाने की कोशिश में जुटी हुई हैं. नरेंद्र मोदी बुनकरों को आश्वासन देते हुए कहते हैं, "मेरे ऊपर भरोसा रखिए बनारस के बुनकर भाइयों, मैं एक साल के भीतर दुनिया में आपके हुनर का डंका बजा दूंगा.''

युवा मतदाता अनीस अहमद को राजनीतिक पार्टियों पर भरोसा नहीं है. उनका कहना है कि, नदी प्रदूषण या धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के प्रति कोई भी पार्टी गंभीर नहीं है. ये पार्टियां केवल मुद्दों को जिंदा भर रखना चाहती हैं.

बनारस का जातीय समीकरण

विकास और मुद्दों की बात करने वाली सभी पार्टियां मतदान के करीब आते ही जातीय समीकरण को साधने में लग गयी हैं. कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ ही भाजपा और आप जैसी पार्टियां भी जातीय समीकरणों की महत्ता समझते हुए, सभी जाति और समुदाय को लुभाने के लिए वायदे कर रही हैं. जातीय समीकरण अनुकूल बनाने में जुटी भाजपा ने कुर्मी वोटों को अपने साथ लाने के लिए भाजपा ने अपना दल को अपने साथ कर लिया है.

यहां लगभग डेढ़ लाख भूमिहार वोटर हैं, कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय भूमिहार जाति से ही हैं जिसका फायदा उन्हें मिल सकता है. करीब दो लाख के आसपास ब्राह्मण वोटर भाजपा या कांग्रेस की ओर झुक सकते हैं. वैश्य, यादव और मुस्लिम वोटरों की संख्या इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. मुस्लिमों में प्रभाव रखने वाली कौमी एकता पार्टी ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया है इसके बावजूद अरविंद केजरीवाल मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने में कामयाब हो रहे हैं. शहरी मतदाताओं के बीच नरेन्द्र मोदी बहुत ही लोकप्रिय हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में केजरीवाल कड़ी चुनौती दे रहे हैं.

रिपोर्ट: विश्वरत्न श्रीवास्तव

संपादन: महेश झा

DW.COM

संबंधित सामग्री