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विज्ञान

अंतरिक्ष से मच्छरों पर निशाना

जर्मनी की एक टीम पश्चिम अफ्रीका में मलेरिया की रोकथाम के लिए सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल कर रही है. इससे उन तालाबों की पहचान हो सकेगी जहां मच्छर पैदा हो रहे हैं.

पश्चिम अफ्रीका में इबोला के फैलने से स्वास्थ्य कर्मचारी बाकी बीमारियों पर ध्यान नहीं दे पा रहे. इन बीमारियों में से एक मलेरिया है और हर साल विश्व भर में करीब 10 लाख लोग इससे अपनी जान गवां बैठते हैं. इनमें से 90 प्रतिशत लोग अफ्रीका में हैं. हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के नॉरबर्ट बेकर कहते हैं, "मलेरिया अफ्रीका का नंबर वन हत्यारा है."

जर्मन वैज्ञानिक पश्चिम अफ्रीकी देश बुर्कीना फासो में टेस्ट कर रहे हैं. 65 साल के डॉक्टर पेटर बेकर कहते हैं कि प्रोजेक्ट से मलेरिया के मामलों को कम किया जा सकेगा. बेकर ने पहले जर्मनी में राइन नदी के किनारे कीड़ों और मच्छरों को खत्म करने की योजना बनाई थी जो काफी सफल हुई. उनकी टीम एक बैक्टीरिया बैसिलस थ्यूरिंगियेंसिस इस्राएलेंसिस का इस्तेमाल करती है. यह कीटाणु मच्छरों के अंडों को मार देता है लेकिन और किसी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाता. बेकर के प्रोजेक्ट से 98 प्रतिशत मच्छर गायब हो गए हैं.

मच्छर तालाबों और कीचड़ में पनपते हैं. राइन नदी के मच्छरों से मलेरिया नहीं होता लेकिन यह लोगों को परेशान तो करते ही हैं. बेकर की टीम अफ्रीका में मच्छरों को मारने की टेस्टिंग कर रही है.

अब तक मलेरिया को खत्म करने के बहुत अच्छे नतीजे नहीं मिले हैं लेकिन बेकर की टीम एक सस्ते विकल्प को ढूंढ रही है. टीम 127 गांवों पर ध्यान दे रही है जहां करीब 1.5 लाख लोग रहते हैं. इनमें से एक तिहाई गांवों में बिस्तर पर लोग जाली लगाते हैं और कीचड़ और तालाब वाले इलाकों में बैक्टीरिया को काम पर लगाया गया है. बुर्कीना फासो में गरीबी बहुत है इसलिए सैटेलाइट की मदद से कीचड़ और तालाबों का पता लगाया जाता है जहां मच्छर होने की संभावना है. फिर कर्मचारी वहां जाकर बैक्टीरिया स्प्रे करते हैं.

36 साल के रिसर्चर डामबाख जर्मन टीम का हिस्सा हैं. वे कहते हैं कि मच्छरों के अंडे साफ पानी में रहते हैं जहां पौधे भी होते हैं. पानी की पारदर्शिता, रंग और उसमें खनिज पदार्थों से पता लगाया जा सकता है कि इसमें मच्छर होंगे या नहीं. सैटेलाइट से आने वाली तस्वीरों में से ऐसे तालाब ढूंढे जाते हैं. बैक्टीरिया को हर 10 दिन में स्प्रे किया जाता है. वैज्ञानिक अभी तक नहीं पता कर पाए हैं कि मलेरिया के मामले कम हुए हैं या नहीं, लेकिन गांव वाले कहते हैं कि मच्छरों की संख्या न के बराबर है.

एमजी/एमजे(डीपीए)

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