1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मंथन

अंतरिक्ष में जीवन की खोज

मंथन के इस अंक में होगी अंतरिक्ष में जीवन की खोज. इस बार मंथन आ रहा है जर्मनी के एफेल्सबर्ग रेडियो टेलिस्कोप से.

यह टेलिस्कोप अंतरिक्ष की कई ऐसी तस्वीरें ले चुका है, जिन्होंने स्पेस साइंस को एक नई शक्ल दी है. मंथन के इस खास अंक में होंगी अंतरिक्ष की बातें. कार्यक्रम में उपग्रहों के जरिए धरती को समझने की कोशिश, अंतरिक्ष की अनोखी तस्वीरें जमा करते टेलिस्कोपों के बारे में रोचक जानकारी और किस तरह की जा रही है मंगल पर जीवन की खोज.

एफेल्सबर्ग के टेलिस्कोप की चौड़ाई 100 मीटर है और इसे 1971 में जर्मनी के माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ने तैयार किया था. 29 साल तक यह दुनिया का इकलौता सबसे बड़ा टेलिस्कोप रहा जिसे घुमाया भी जा सके. यह ब्लैक होल्स पर नजर रखता है, इस बात के आंकड़े जुटाता है कि हवा में धूल मिट्टी के अंश कितने बढ़ गए हैं, कौन सी गैस कितनी मात्रा में है. इसे और करीब से जानें मंथन की रिपोर्ट में.

इस तरह के टेलिस्कोप जमीन पर रह कर आसमान की तस्वीरें ले रहे हैं, तो आसमान में कई सैटेलाइट भी हैं जो अंतरिक्ष से पृथ्वी की तस्वीरें लेते हैं. यूरोपियन स्पेस एजेंसी ईएसए ने 2013 में तीन ऐसे सैटेलाइट भेजे. स्वार्म नाम के इस प्रोजेक्ट को नवंबर में लॉन्च किया गया. स्वार्म का मकसद है धरती के मैग्नेटिक फील्ड यानी चुंबकीय क्षेत्र की जांच करना और यह समझना कि सूरज का हमारी पृथ्वी पर कैसा असर पड़ता है.
ब्रह्मांड में हर वक्त कॉस्मिक कणों की बमबारी से जूझती हमारी पृथ्वी. ये कण सूर्य और ब्रह्मांड की गहराइयों से आते हैं. लेकिन धरती का चुंबकीय क्षेत्र इस बमबारी को आराम झेलता है. इसी की बदौलत हम जिंदा हैं. इस अदृश्य चुंबकीय बल की जांच तीन स्वॉर्म सैटेलाइटें कर रही हैं. पहली बार पता चला है कि कैसे विस्तार और समय के साथ चुंबकीय क्षेत्र बदलता है. चार साल तक ये तीनों सैटेलाइट धरती के चक्कर लगाएंगे, वैसे ही जैसे चांद लगाता है. क्या क्या उम्मीदें हैं स्वार्म से, जानिए मंथन की खास रिपोर्ट में.

जर्मनी का एफेल्सबर्ग रेडियो टेलिस्कोप दुनिया के सबसे अहम टेलिस्कोपों में गिना जाता है. मंथन की रिपोर्टों में आप देख सकते हैं दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे जरूरी टेलिस्कोप ऑब्जर्वेटरी आल्मा में. आल्मा यानि अटाकामा लार्ज मिलीमीटर ऐरे. 2011 में इसे यूरोप, अमेरिका, कनाडा, जापान, ताइवान और चिली की मदद से शुरू किया गया.

स्पेस साइंस में भारत भी पीछे नहीं है. भारतीय वैज्ञानिक दुनिया भर में मौजूद हैं और अंतरिक्ष को बेहतर समझने पर काम कर रहे हैं. मंथन में खास मेहमान हैं एक ऐसे ही भारतीय से जो जर्मनी के खूबसूरत शहर हाइडलबर्ग की लैब में यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आखिर ज़िंदगी की शुरुआत कब और कैसे हुई.

टेलिस्कोप की बात हो रही हो और केपलर का जिक्र ना हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता. केपलर ने हमारी आकाश गंगा की कई 3डी तस्वीरें निकाली. केपलर के ही कारण यह पता चल सका कि पृथ्वी के ही आकार के अस्सी अरब ग्रह और मौजूद हैं. अगर केपलर के पहियों में खराबी ना आई होती तो और भी बहुत कुछ पता चल सकता था. मंथन की खास रिपोर्ट में केपलर को बेहतर रूप से समझें.

फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं भारत के मंगलयान पर. मंगलयान का मुख्य काम होगा मंगल ग्रह पर मीथेन की संभावना को तलाशना. ऐसा इसलिए क्योंकि मीथेन को पृथ्वी पर जीवन के लिए अहम माना जाता है. मंथन की विशेष रिपोर्ट में मिलवाएंगे आपको एक ऐसी रिसर्चर से जो मंगल को समझने में लगी है.

एसएफ/ एएम

DW.COM

संबंधित सामग्री