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दुनिया

अंतरराष्ट्रीय सैन्य खर्च में गिरावट

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो दुनिया भर में पिछले साल सैन्य हथियारों पर कम खर्चा किया गया. लेकिन जहां अमेरिका जैसे देशों ने अपनी सेना पर कम खर्च किया, वहीं भारत, चीन और रूस हथियारों पर पहले से ज्यादा निवेश कर रहे हैं.

2012 के बाद लगातार दूसरे साल हथियारों के कुल खर्च में गिरावट आई है. यह जानकारी स्वीडन के पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट, सिपरी ने अपनी नई रिपोर्ट में दी है. सिपरी का कहना है कि सैन्य खर्चे में गिरावट का एक बड़ा कारण अमेरिका है, जिसने अपनी सेना का बजट कम कर दिया है.

सिपरी के मुताबिक 2013 में पूरी दुनिया में 1.73 हजार अरब डॉलर सैन्य हथियारों पर खर्च किये गए जो 2012 के मुकाबले 1.9 प्रतिशत कम था. हालांकि कटौती के बावजूद अमेरिका अब भी बाकी देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा पैसा अपनी सेना पर खर्च करता है, करीब 640 अरब डॉलर. सिपरी के मुताबिक अमेरिकी खर्चे में कमी की वजह इराक और अफगानिस्तान से उसके सैनिकों की वापसी और अमेरिकी कांग्रेस द्वारा की गई बजट कटौती है.

अमेरिका अब भी आगे

Samuel Perlo-Freeman SIPRI

पेर्लो फ्रीमैनः क्षेत्रीय समीकरणों की बड़ी भूमिका

अमेरिका जितने पैसे अपनी सेना पर खर्च करता है वह टॉप 10 में शामिल बाकी नौ देशों के कुल रक्षा खर्च के बराबर है. हैरानी वाली बात यह है कि अगर सूची से अमेरिका को निकाल दिया जाए तो वैश्विक स्तर पर सैन्य खर्च में बढ़ोत्तरी हुई है. अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर आने वाले चीन के सालाना खर्चे में 7.4 प्रतिशत इजाफा हुआ है. चीन अपनी सेना पर करीब 188 अरब डॉलर खर्च करता है जबकि रूस ने अपने खर्चे को पांच फीसदी बढ़ाया है. मॉस्को ने पिछले साल सैन्य तैयारियों पर करीब 88 अरब डॉलर खर्च किए हैं. 2012 के मुकाबले सऊदी अरब का खर्चा 14 प्रतिशत बढ़ा है और उसने 2013 में अपनी सेना पर 67 अरब डॉलर खर्च किए.

इनके बाद बारी आती है फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, भारत और दक्षिण कोरिया की. सिपरी की एक दूसरी रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत, चीन और पाकिस्तान दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशी हथियार खरीदते हैं. 2009 से लेकर 2013 तक अमेरिका ने दुनिया में सबसे ज्यादा यानी 29 प्रतिशत हथियार बेचे हैं. रूस ने 27 प्रतिशत, जर्मनी ने सात, चीन ने छह और फ्रांस ने पांच प्रतिशत हथियार बेचे हैं.

क्षेत्रीय समीकरण

हथियार खरीदने में क्षेत्रीय राजनीति बड़ी भूमिका निभाती है. अमेरिका, पश्चिम और मध्य यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में बचत कार्यक्रमों की वजह से सैनिक खर्चे में कटौती की गई लेकिन अफ्रीका, एशिया, पूर्वी यूरोप, दक्षिण अमेरिका और मध्यपूर्व में देशों ने पहले से ज्यादा हथियार खरीदे. सिपरी के सैन्य खर्च कार्यक्रम के प्रमुख सैम पर्लो फ्रीमैन ने कहा, "कुछ मामलों में यह आर्थिक विकास का स्वाभाविक नतीजा है और कुछ जगहों में सुरक्षा के देखते हुए और पैसे खर्च किए गए हैं." पर्लो फ्रीमैन कहते हैं कि कुछ क्षेत्रों में देखा जाए तो सरकारों ने प्राकृतिक संसाधनों से कमाए गए पैसों को हथियारों में लुटाया है. कहीं कहीं सैन्य खर्चे उन देशों में तानाशाहों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है. कुछ इलाकों में तो साफ साफ हथियारों की होड़ दिखती है.

मिसाल के तौर पर चीन, जिसके खर्च की वजह से एशिया के सैन्य खर्च में 3.6 प्रतिशत की बढ़त हुई है. दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव की वजह से फिलिपींस और वियतनाम ने भी हथियार जमा करना शुरू कर दिया है. मध्यपूर्व में इराक और बहरीन में सैन्य खर्चा बढ़ा है. अफ्रीका में अल्जीरिया और अंगोला ने तेल और गैस खनन से कमाए गए पैसों से हथियार खरीदे. 2004 के मुकाबले इन्होंने सेना पर लगभग दोगुने पैसे खर्च किए हैं. अफगानिस्तान, अजरबैजान, चीन, रूस और सऊदी अरब भी इसी श्रेणी में आते हैं.

एमजी/ओएसजे(डीपीए, एपी)

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