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विज्ञान

अंटार्कटिक में 10 लाख साल पुरानी हवा

करीब 10 लाख साल पहले अंटार्कटिक की बर्फ में फंसी हुई वायु के बारे में शोध के लिए जापान वहां अपना एक नया बेस स्थापित करना चाहता है. उनका मानना है कि इससे वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद मिलेगी.

जापान पहले ही अंटार्कटिक क्षेत्र में अपने चार बेस बना चुका है. फिलहाल इनमें से दो स्टेशन काम कर रहे हैं. इनमें से एक है तटीय इलाके में स्थित स्योवा स्टेशन और दूसरा है इनलैंड या धरती पर बसा हुआ डोम फुजी स्टेशन. इस स्टेशन पर शोधकार्य में लगी जापानी रिसर्च टीम ने ही तीन हजार मीटर की गहराई तक ड्रिलिंग कर लाखों साल पहले बनी बर्फ में फंसी हुई हवा का सैंपल हासिल किया है. यह सैंपल करीब सात लाख बीस हजार साल पहले का बताया जाता है.

पहले चाहिए 'अंटार्कटिक संधि'

नया बेस बना कर वैज्ञानिक और ज्यादा गहराई तक पहुंचने की कोशिश करेंगे. इस बार उनकी योजना इतनी गहराई तक ड्रिलिंग करने की है जिससे कम से कम दस लाख साल पुरानी बर्फ का सैंपल हासिल किया जा सके. फिलहाल दुनिया में सबसे पुरानी बर्फ का सैंपल निकालने का रिकार्ड यूरोपीय रिसर्च टीम के नाम है जिसने आठ लाख साल पुरानी बर्फ निकाली थी.

जापान के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय का कहना है, "पिछले हफ्ते एक सरकारी पैनल चर्चा के दौरान यह विचार सामने आया. साल 2016 से शुरु हो रहे अगले छह सालों के अंटार्कटिक प्रोजेक्ट के लिए यह एक काफी महत्वपूर्ण संभावना है."

किसी एक की मिल्कीयत नहीं

मंत्रालय के हवाले से समाचार एजेंसी एएफपी को यह जानकारी मिली है कि अभी जापान सरकार एक नया बेस बनाने की संभावना पर विचार कर रही है. मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, "अभी इसका निश्चय नहीं किया गया है. पहले इसे अंटार्कटिक संधि के अंतर्गत अनुमोदित होना होगा."

अंतरराष्ट्रीय अंटार्कटिक संधि में इस बात पर सर्व सम्मति बननी है कि अंटार्कटिक किसी एक देश की मिल्कीयत नहीं है बल्कि इस क्षेत्र पर अमेरिका, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कुछ यूरोपीय देशों समेत दर्जनों देशों का अधिकार है. इन सभी देशों को इस बात के लिए संधि पर हस्ताक्षर करने हैं कि वे सब अंटार्कटिक का इस्तेमाल वैज्ञानिक शोधों के लिए कर सकते हैं. इसके अलावा उन्हें इस बात पर भी सहमति बनानी होगी कि वे वैज्ञानिक आंकड़ों को एक दूसरे से साझा करेंगे और उनमें से कोई भी वहां सैन्य यंत्र नहीं लगाएगा.

लाखों साल पुरानी हवा

वीडियो देखें 04:03

ध्रुवों की पिघलती बर्फ

वैज्ञानिक प्राचीन काल में बर्फ में फंस गई हवा पर शोध कर यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उस समय वातावरण की प्राथमिक संरचना कैसी थी. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि लाखों साल पहले के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड और तापमान से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण कर वे समझ पाएंगे कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन किस दिशा में बढ़ेगा.

पहले हुए रिसर्च से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि पृथ्वी पर अंटार्कटिक सबसे गर्म होते पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है. साल 1970 के मुकाबले अब कड़ाके की ठंड वाले मौसम में अंटार्कटिक का तापमान पांच से छह डिग्री ज्यादा दर्ज हुआ है.

वॉशिंगटन की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की 2011 में आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अंटार्कटिक के पेंग्विनों की दो प्रजातियां ऐसी हैं जिनकी तादाद तेजी से घटती जा रही है. ग्लोबल वॉर्मिंग से पिघलते सागर, बड़ी संख्या में मछलियों के शिकार और कुछ दूसरी वजहों से उनका भोजन छिनता जा रहा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हवा और पानी का तापमान बढ़ने के कारण समुद्री बर्फ में कमी आई है जिसका पेंग्विनों की संख्या पर बुरा असर हुआ है.

आरआर/आईबी (एएफपी)

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