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मनोरंजन

"अंग्रेजी में सोचता हूं, हिंदी में लिखता हूं"

विदेश में रचे जा रहे हिंदी साहित्य के क्षेत्र में कथाकार तेजिंदर शर्मा का नाम अग्रणी है. वह न सिर्फ हिंदी में साहित्य रच रहे हैं, बल्कि लंदन में कथा-यूके के जरिए से हिंदी, उर्दू और पंजाबी साहित्य का प्रचार करते हैं.

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पिछले दिनों भारत आए तेजिंदर से उनके साहित्य, हिंदी के प्रचार के लिए किए जा रहे उनके प्रयासों और विदेशों में रचे जा रहे साहित्य की प्रकृति और दिशा जैसे मुद्दों पर निर्मला भुराड़िया ने उनसे चर्चा की. प्रस्तुत है उसी चर्चा के अंश:

लेखक बनने का खयाल कैसे आया ? सबसे पहले आपने क्या लिखा ?

लेखक बनने के बारे में सोचा नहीं जाता है. यह कला के काम जो काम ये प्रकृति प्रदत्त है, जो किसी न किसी स्टेज पर शुरू हो जाता है और आपको पता चलता है कि आपको कलम चलाने का शौक हो गया है, आपको कोई सिखाता नहीं है.

आपकी पहली रचना कौन-सी थी ?

मेरे केस में मामला थोड़ा अलग है. मेरे पिता उर्दू और पंजाबी में रचना करते थे, उपन्यास और नज्म लिखी, घर में माहौल था, वे मुझे सुनाया करते थे. बहुत बचपन से ही मैं उनका श्रोता था. धीरे-धीरे कुछ बनने लगा. शायद जब

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मैं 9वीं में था तब पहली कविता और 10वीं में पहली कहानी लिखी, दोनों अंग्रेजी में थी. मेरी सारी पढ़ाई अंग्रेजी में, दिल्ली यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एमए किया. मेरी सोच की ज़बान अंग्रेजी थी. इसलिए पहला अक्षर अंग्रेजी में ही लिखा गया.

फिर हिंदी में लिखना कैसे शुरू किया ?

पत्नी इंदु दिल्ली के आईपी कॉलेज से हिंदी में एमए कर चुकी थी. शादी के बाद पीएचडी शुरू की. डॉ. दिव्येश ठाकुर के अंडर में पीएचडी कर रही थी. उनके सब्जेक्ट में सारे नए उपन्यास 1975 से 80 के बीच के थे. उन्होंने कहा कि आप भी हिंदी उपन्यास पढ़ें तो हम डिस्कस करेंगे. मैंने पढ़ना शुरू कर दिया. हिंदी में उपन्यास पढ़ने का कोई बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था.

पहली बार पढ़ रहे थे ?

ऐसा नहीं है बचपन में थोड़े बहुत खास किस्म के उपन्यास पढ़े है, जैसे जासूसी टाइप के उपन्यास थे. लेकिन जल्दी ही पेरी मेसिन वगैरह ने उनकी जगह ले ली. हिंदी वाले पीछे चले गए, लेकिन गंभीर साहित्य हिंदी में कभी पढ़ा नहीं. जब इंदुजी ने मुझे पढ़ने के लिए दिया तो पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा कि मैं भी ऐसा लिख सकता हूं. मैंने एक कहानी लिखी. बीए में मेरे एक लेक्चरर थे श्याम मोहन जुत्शी, वे अव दिवंगत हो चुके हैं, मुझे बहुत प्यार करते थे.

मैंने अपने संबंधों और उनके जीवन को लेकर एक 23-24 पेज की कहानी लिखी, प्रतिबिंब. इंदुजी ने पढ़ा और खूब हंसी. उन्होंने कहा कि ये क्या लिखा है? मैंने पूछा क्या हुआ? तो उन्होंने कहा कि आपकी समस्या यह है कि आप सोचते अंग्रेजी में हैं औऱ लिखते हिंदी में है. इसलिए आपका सेंटेंस स्ट्रक्चर अंग्रेजी का है और शब्द हिंदी और अंग्रेजी की खिचड़ी-सी है

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भारतीय साहित्य में बढ़ रही है विदेशियों की रुचि

. ये तो कुछ बना नहीं.

फिर इलाज क्या किया ?

उन्होंने कहा कि आप पंजाबी में सोचिए और हिंदी में लिखिए. पंजाबी मेरी मातृभाषा है. मैं अपने माता-पिता और रिश्तेदारों से पंजाबी में ही बात करता था. तो दोबारा उस कहानी को पंजाबी में सोची और हिंदी में लिखी. फिर इंदुजी ने उस कहानी को 10-12 पेज में समेट दी. कहानी नवभारत टाइम्स में छप गई. इससे मुझे जबरदस्त प्रेरणा मिली.

छपना तो प्रेरणा होती है , लेकिन इसके अतिरिक्त और प्रेरणा क्या रही ? कोई भावनात्मक प्रेरणा... ?

जैसा कि मैंने पहले बताया कि घर का माहौल तो था ही. दूसरा मैं एयर इंडिया में फ्लाइट पर्सन था. वहां से जो दुनिया दिखाई देती थी, वह बहुत विचित्र थी. मैं फाइव स्टार होटलों में रहता था और गल्फ की फ्लाइट्स पर भारत के मजदूरों को ले जाता था. तो मैं उन मजदूरों की हालत देखता था. मैंने कुवैत पर इराक का आक्रमण हुआ, उस सबको व्यक्तिगत रूप से देखा और महसूस किया है. उस दौरान वहां से भागते भारतीयों को मैंने करीब से देखा था. तो मेरी दुनिया एक अलग दुनिया थी.

आपका आम आदमी दूसरों के आम आदमी से अलग था ? आपके अनुभव अलग है , ऐसा लगता है आपको ?

हां, मैंने एक बार यादव जी, राजेंद्र यादव से कहा कि यदि मैं मजदूर और किसान पर लिखूंगा तो झूठ लिखूंगा. क्योंकि मैं भारतीय मजदूर और किसान को नहीं जानता, लेकिन यदि मैं विमान को जानता हूं, तो मैं उसी पर लिखूंगा. सिर्फ इसलिए कि आलोचकों को विमान के बारे में नहीं पता हो मैं उस पर नहीं लिखूं, ये तो कोई बात नहीं है. मेरी दूसरी ही कहानी एक एयर होस्टेस की जिंदगी पर आधारित थी, उड़ान. इसे दिव्येश ठाकुर ने 1982 की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में शामिल किया. किसी लेखक की दूसरी ही कहानी श्रेष्ठ कही जाए तो बहुत आत्मविश्वास बढ़ता है.
इसे मैंने स्ट्रीम ऑफ कंशसनेस की टैक्निक इस्तेमाल की, उन दिनों जेम्स जॉयस का काफी असर था उनकी यूलिसिस और ए पोट्रेट ऑफ द आर्टिस्ट एज ए यंग मैन को पढ़ा था. तो उस टैक्निक का उड़ान में इस्तेमाल किया था. छपी कहानी देखकर तो आत्म-विश्वास आता ही है. फिर सम्मानित भी हुई तो हौसला और भी बढ़ा.

कथा यूके क्या है ? इसके माध्यम से काफी काम कर रहे हैं ? ये क्या योजना है आपकी ?

इंदुजी ने मुझे कहानी लिखना सिखाई. उनकी 1995 में कैंसर से मौत हो गई. तो उनकी याद में इंदु शर्मा कथा सम्मान दिया जाने लगा. पहले पांच सम्मान मुंबई में हुए, क्योंकि मैं वहीं था. फिर मैं लंदन चला गया तो सम्मान वहां पहुंच गया. कथा यूके के माध्यम से हम हर साल हाउस ऑफ लार्डस या कॉमंस यानी ब्रिटिश संसद में हिंदी सम्मान समारोह आयोजित करते हैं. लेखक को बाकायदा बुलाते हैं, एक हफ्ता वहां रखते है, वहां की महत्वपूर्ण जगहें दिखाते हैं कम-से-कम शेक्सपीयर का

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घर दिखाते हैं, वहां के लेखकों से संवाद का मौका देते हैं. हिंदी, उर्दू और पंजाबी में दिया जाता है. भारतीय साहित्य को एक प्लेटफार्म देने का मौका देते हैं.

प्रवासी भारतीय साहित्य को आप कैसे परिभाषित करते हैं ?

इस टर्म को मैं ज्यादा समझ नहीं पाया, क्योंकि अगर ब्रिटेन, अमेरिका, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम या फिर खाड़ी देश में लिखा जा रहा साहित्य प्रवासी साहित्य है तो ये कैसे संभव है, क्योंकि ब्रिटेन औऱ मॉरीशस के लेखकों के सरोकार एक हो नहीं सकते. दोनों इतने अलग देश है, फिजी इतना अलग देश है कि अगर लेखक एक ही चीज लिख रहे हैं तो फिर उसे साहित्य को तो समुद्र में फेंक दिया जाना चाहिए. क्योंकि अगर सब जगह रहकर उस देश उस सोसायटी के सरोकार नहीं आ रहे हैं तो जहां हम रह रहे है तो हम सिर्फ नॉस्टेलिया लिख रहे हैं.

क्या आप कथा यूके के माध्यम से इस सारे साहित्य को जोड़ना चाहेंगे. आपकी योजनाएं क्या है ?

हम कथा-गोष्ठियां करते हैं. वहां कहानी और पाठक होता है, उस पर उसी वक्त कमेंट होता है. इसमें थोड़ा बदलाव किया गया है. एक हिंदी की और एक उर्दू की. फिर अगली बार एक हिंदी की और एक पंजाबी कहानी होती है. ऐसे में एक सवाल लगातार उठता रहा है कि प्रवासी साहित्य सिर्फ हिंदी में ही क्यों होता है? अंग्रेजी में ऐसा नहीं है. भारत में अंग्रेजी साहित्य बहुत लिखा गया, लेकिन उसे प्रवासी साहित्य नहीं कहा जाता है.
ब्रिटेन ने तो पूरी दुनिया में राज्य किया, भारत में अंग्रेजी साहित्य बहुत लिखा गया, वे इसे सिर्फ इंग्लिश लिट्रेचर ही कहा. क्या आपने सुना है प्रवासी डच साहित्य या प्रवासी जर्मन साहित्य? वे इसे अंग्रेजी लिट्रेचर ही कहते हैं, उन्होंने उसे मुख्य धारा का हिस्सा बनाए रखा. दरअसल ये रिजर्वेशन्स पॉलिसी है वही गलत है, षड़यंत्र है, महिला लेखन या दलित लेखन, प्रवासी लेखन ये गलत है. मतलब साहित्य को खानों में नहीं बांटा जाना चाहिए.

सौजन्यः वेबदुनिया

संपादनः ए कुमार

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