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दिमाग के लिए जहर है शराब

ओंकार सिंह जनौटी
३ जनवरी २०१५

कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान तो कभी आराम, पीने वाले शराब पीने का मौका खोज ही लेते हैं. पीते ही इंसान का मूड बदल सा जाता है, कुछ लोग ज्यादा बात करने लगते हैं. आखिर शराब हमारे शरीर के भीतर क्या करती है.

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तस्वीर: Fotolia/Photosebia

शैंपेन की घूंट मुंह में जाते ही दिमाग और शरीर पर बेहद अलग असर होने लगता है. मुंह में जाते ही शैंपेन को कफ झिल्ली सोख लेती है. घूंट के साथ बाकी शराब सीधे छोटी आंत में जाती है. छोटी आंत भी इसे सोखती है, फिर यह रक्त संचार तंत्र के जरिए लीवर तक पहुंचती है.

हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हेल्मुट जाइत्स के मुताबिक, "लीवर पहला मुख्य स्टेशन है. इसमें ऐसे एन्जाइम होते हैं जो अल्कोहल को तोड़ सकते हैं." यकृत यानी लीवर हमारे शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर करता है. अल्कोहल भी हानिकारक तत्वों में आता है. लेकिन यकृत में पहली बार पहुंचा अल्कोहल पूरी तरह टूटता नहीं है. कुछ अल्कोहल अन्य अंगों तक पहुंच ही जाता है.

जाइत्स कहते हैं, "यह पित्त, कफ और हड्डियां तक पहुंच जाता है, यहां पहुंचने वाला अल्कोहल कई बदलाव लाता है." अल्कोहल कई अंगों पर बुरा असर डाल सकता है या फिर 200 से ज्यादा बीमारियां पैदा कर सकता है.

सिर पर धावा

बहुत ज्यादा अल्कोहल मस्तिष्क पर असर डालता है. आस पास के माहौल को भांपने में शरीर गड़बड़ाने लगता है, फैसला करने की और एकाग्र होने की क्षमता कमजोर होने लगती है. शर्मीलापन कमजोर पड़ने लगता है और इंसान खुद को झंझट मुक्त सा समझने लगता है.

लेकिन ज्यादा मात्रा में शराब पीने से ये अनुभव बहुत शक्तिशाली हो जाते हैं और इंसान बेसुध होने लगता है. उसमें निराशा का भाव और गुस्सा बढ़ने लगता है. और यहीं मुश्किल शुरू होती है. 2012 में दुनिया भर में शराब पीने के बाद हुई हिंसा या दुर्घटना में 33 लाख लोगों की मौत हुई, यानी हर 10 सेकेंड में एक मौत.

अल्कोहल को मस्तिष्क तक पहुंचने में छह मिनट लगते हैं. जाइत्स इस विज्ञान को समझाते हैं, "एथेनॉल अल्कोहल का बहुत ही छोटा अणु है. यह खून में घुल जाता है, पानी में घुल जाता है. इंसान के शरीर में 70 से 80 फीसदी पानी होता है. इसमें घुलकर अल्कोहल पूरे शरीर में फैल जाता है और मस्तिष्क तक पहुंच जाता है."

सिर में पहुंचने के बाद अल्कोहल दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटरों पर असर डालता है. इसकी वजह से तंत्रिका तंत्र का केंद्र प्रभावित होता है. अल्कोहल की वजह से न्यूरोट्रांसमीटर अजीब से संदेश भेजने लगते हैं और तंत्रिका तंत्र भ्रमित होने लगता है.

कभी कभी इसका असर बेहद घातक हो सकता है. कई सालों तक बहुत ज्यादा शराब पीने वाले इंसान के शरीर में जानलेवा परिस्थितियां बनने लगती हैं, "ऐसा होने पर विटामिन और जरूरी तत्वों की आपूर्ति गड़बड़ाने लगती है, इनका केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में अहम योगदान होता है." उदाहरण के लिए दिमाग को विटामिन बी1 की जरूरत होती है. लंबे समय तक बहुत ज्यादा शराब पीने से विटामिन बी1 नहीं मिलता और वेर्निके-कोर्साकॉफ सिंड्रोम पनपने लगता है, "दिमाग में अल्कोहल के असर से डिमेंशिया की बीमारी पैदा होने का खतरा बढ़ने लगता है."

दूसरे खतरे

मुंह और गले में अल्कोहल कफ झिल्ली को प्रभावित करता है, भोजन नलिका पर असर डालता है. लंबे वक्त तक ऐसा होता रहे तो शरीर हानिकारक तत्वों से खुद को नहीं बचा पाता है. इसके दूरगामी असर होते हैं. जाइत्स के मुताबिक पित्त संक्रमण का शिकार हो सकता है, "हम अक्सर भूल जाते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर और आंत के कैंसर के लिए अल्कोहल भी जिम्मेदार है." लीवर में अल्कोहल के पचते ही हानिकारक तत्व बनते हैं, जो लीवर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं. जर्मनी में हर साल करीब 20 से 30 हजार लोग लीवर सिर्होसिस से मरते हैं.

जाइत्स चेतावनी देते हुए कहते हैं, "लीवर में अल्कोहल के पचते ही लोग सोचते हैं कि जहर खत्म हो गया लेकिन ये आनुवांशिक बीमारियां भी पैदा कर सकता है."

दुनिया भर में अल्कोहल

जर्मनी में प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल सेवन दर करीब 12 लीटर सालाना है. 12 लीटर शुद्ध अल्कोहल का मतलब 500 बोतल बीयर प्रति व्यक्ति. यूनाइटेड किंगडम और स्लोवेनिया में प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल खपत 11.6 लीटर सालाना है.

आयरलैंड और लक्जमबर्ग के लोग जर्मनों से भी ज्यादा अल्कोहल गटकते हैं. बेलारूस का नंबर तो पहला है, वहां साल भर में औसतन एक व्यक्ति 17.5 लीटर शुद्ध अल्कोहल पीता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शुद्ध अल्कोहल सेवन के मामले में पाकिस्तान, कुवैत, लीबिया और मॉरीतानिया सबसे नीचे हैं. वहां प्रति व्यक्ति शुद्ध अल्कोहल सेवन दर 100 मिलीलीटर प्रति वर्ष है.

भारत में यह आंकड़ा 8.7 लीटर सालाना है. लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत में पीने वाले बहुत ही ज्यादा पीते हैं. वो एक साल में 28.7 लीटर शुद्ध अल्कोहल गटक जाते हैं, यानी करीब एक हजार बोतल बीयर या करीबन 90-100 बोतल व्हिस्की या रम. इस लिहाज से देखा जाए तो भारतीय पियक्कड़ दुनिया में सबसे ज्यादा शुद्ध अल्कोहल गटकते हैं.

चीन, जापान और कोरिया के 40 फीसदी लोगों में एसेटअल्डिहाइट नाम का एन्जाइम नहीं पाया जाता. यह शरीर में अल्कोहल के असर को कम करने में मदद करता है. जाइत्स कहते हैं, "अल्कोहल एसेटअल्डिहाइट में बदलता है और एसेटअल्डिहाइट एसेटिक एसिड में. लेकिन अगर एसेटअल्डिहाइट एसेटिक एसिड में न बदले तो एसेटअल्डिहेड बनता है." आनुवांशिक कारणों के चलते कई एशियाई लोग अल्कोहल नहीं पचा पाते, उसके पीछे यही वजह है. अगर ऐसे लोग अल्कोहल पीते हैं तो उन्हें सिरदर्द, उल्टी और चक्कर जैसी शिकायतें होने लगती है. कइयों का चेहरा लाल हो जाता है.

लेकिन अल्कोहल का दवा के रूप में भी सदियों से इस्तेमाल हो रहा है. जाइट्स के मुताबिक कभी कभार बहुत ही कम मात्रा में लिया जाने वाला अल्कोहल रक्त नलिकाओं को सख्त बनने से रोकता है. दवा की तरह लिया गया अल्कोहल हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा भी कम करता है. लेकिन मुश्किल यह है कि पीने वाले एक गिलास पर नहीं रुकते हैं और यहीं से अल्कोहल के दुष्चक्र की शुरुआत होती है.

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