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इस जहां में इशरत

१० जुलाई २०१३

बहुत आसान था इसे किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म या उपन्यास का प्लॉट कह देना. पढ़ने का लुत्फ लेना और अपने रास्ते चल देना लेकिन ये कोई मनोरंजन सामग्री नहीं, सीबीआई का दस्तावेज है जिसका शीर्षक है, इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड.

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तस्वीर: picture-alliance/AP

ये मामला सीबीआई के करियर की शायद सबसे विशिष्ट मानवीय जांच होगी. उसका सबसे कड़ा इम्तहान भी यही है और यह सवाल भी कि सीबीआई नाम का पंछी क्या पिंजरे से  आजाद है या हम जो देख सुन रहे हैं वो एक हत्याकांड के बहाने देश की दो राजनीतिक पार्टियों का वार पलटवार है और सीबीआई मोहरा या वास्तव में ये सच को सामने लाने की एक जेनुइन कोशिश है. हालांकि सवाल फिर उठ जाता है कि ये कोशिश क्या किसी टाइमिंग से संचालित हैं. कहने वाले और विरोध करने वाले तो 2004 में ही कह रहे थे कि इस मुठभेड़ की जांच होनी चाहिए. आतंकियों के नाम पर किन्हें घेरा और मारा गया, ये सवाल तो तभी उठ गए थे. नौ साल लग गए, मान लेते हैं कि देर हुई अंधेर न हुआ होगा. सीबीआई ने रोंगटे खड़े कर देने वाले अंदाज में परत दर परत घटना दर घटना इस मामले की तहकीकात की और दस्तावेज तैयार किये हैं. नौ साल बाद ये मामला एक बहुत बड़े फरेब की तरह सामने आ गया है और लोकतांत्रिक देश के उसूलों और उसकी आत्मा पर बुरी तरह चोट कर रहा है.

सीबीआई के पास काश ऐसी मुस्तैदी पहले से रहती लेकिन वह भी आखिरकार एक तोता ही बताया गया है. तोते की बात तो होती है लेकिन पिंजरे की बात न जाने क्यों नहीं होती. सीबीआई-आईबी विवाद आखिर इस पिंजरे की बनावट का ही तो नतीजा है. एजेंसियां एक कदम आगे दो कदम पीछे की स्थिति में रहती आई हैं. बहरहाल इशरत जहां मामले में अब सबको सांप सूंघ गया है और इसमें सुरक्षा एजेंसियों के आला अधिकारियों से लेकर राजनीतिक दलों के नेता और मीडिया का एक तबका है.

अब किसी को असल में कोई फर्क नहीं पड़ता. मुठभेड़ों में किसी को कहीं भी मार दिया जा सकता है, किसी पर कोई भी इल्जाम धरा जा सकता है, किसी को भी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, किसी के भी वजूद पर कभी भी कोई सवाल खड़ा किया जा सकता है, किरदार की तो हम बात ही नहीं कर रहे हैं. उसे जब चाहे धूल धूसरित किया जा सकता है.

आम लोग कभी नहीं जान सकते थे, लेकिन सीबीआई के जरिए ही अब जान पा रहे हैं कि इशरत जहां कौन थी. कहां जा रही थी और कैसे उसका अपहरण किया गया. उसे संभवतः यातना दी गई और कैसे उसे नजदीक से गोली मारकर उस कुख्यात तस्वीर में कैद हो जाने के लिए लाश बनाकर सड़क किनारे उन तीन युवकों के साथ डाल दिया गया जो मुठभेड़ करने वाले महानुभावों के मुताबिक आतंकी थे और गुजरात के मुख्यमंत्री को मारने के मकसद से कहीं से निकले थे.

इशरत जहां के परिजन कहते हैं कि उनकी लड़ाई इतनी सी है कि कोई और बेकसूर लड़की इस तरह किसी आतंक के फंदे में न आ जाए. वो घर से काम पर निकले और सुरक्षित घर लौट आए. अपने परिवार के साथ खुशी बांटे और बेफिक्र नींद में सो जाए, अगले दिन की मेहनत के लिए खुद को तैयार करते हुए.

असुरक्षा का जो वातावरण हमारे चारों ओर फैल गया है वो भयानक है. निर्भया और दामिनी और कोई भी नाम आप बना लीजिए या वास्तविक नाम ही लीजिए जैसे इशरत...देश की ज्यादातर जमातें किसी न किसी बहाने प्रकट और अप्रकट क्रूरताओं से घिरी है. और हमेशा वे कमतर लोग हैं. वंचित लोग. दलित, स्त्रियां, अल्पसंख्यक, बच्चे, आदिवासी.

गुजरात के मुख्यमंत्री चुप हैं. उनके तत्कालीन गृह मंत्री चुप हैं. मंदिर निर्माण का बीड़ा उठाया जा चुका है. इधर सीबीआई ने एक बीड़ा उठाया है. बीजेपी के लिए सीबीआई अचानक विलेन है, कांग्रेस ने पत्ते फेंटने शुरू कर दिए हैं. टीवी बहसों और बयानों की बाढ़ आ गई है. 2014 के करीब आते आते हम न जाने कितने ऐसे भंडाफोड़ देखने वाले हैं. कितने झूठों से पर्दा उठने वाला है. सवाल यही है कि ये पर्दा उठा ही रहेगा और जनता को एक सजग विश्लेषण और सही फैसले का मौका देगा या कुछ समय बाद या समय पूरा होते ही गिर जाएगा. जैसे किसी नाटक का पर्दा.  मृत्यु अगर नाटक नहीं है तो किसी की हत्या करना भी नाटक नहीं हो सकता. हमें ये नहीं भूलना चाहिए, पर्दा उठे या न उठे.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादनः एन रंजन

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